माइक्रोप्लास्टिक, मिक्रोबीड्स (Microplastics / Microbeads)| पर्यावरण संबंधित महत्वपूर्ण समझौते

पर्यावरण संबंधित महत्वपूर्ण समझौते

पर्यावरण संबंधित महत्वपूर्ण समझौते


माइक्रोप्लास्टिक / मिक्रोबीड्स

  • माइक्रोप्लास्टिक या मिक्रोबीड्स, प्लास्टिक के अंश या रेशे है जो बहुत छोटे होते हैं. इन का आकार सामान्यतः 1 मिलीमीटर से कम होता है.
  • इनके विभिन्न प्रकार के प्रयोग होते हैं, जिनसे विशेष रूप से व्यक्तिगत देखभाल के उत्पाद जैसे- टूथपेस्ट, कपड़े, बॉडी क्रीम एवं औद्योगिक उपयोग आदि शामिल है.
  • इनमें सरलतापूर्वक फैलने की क्षमता होती है और यह उत्पाद को रेशमी बुनावट और रंग प्रदान करते हैं. इस प्रकार यह प्रसाधन सामग्री उत्पादों को दृश्य प्रभाव प्रदान करते हैं.

माइक्रोप्लास्टिक के साथ समस्याएं

  • यह नॉन बायोडिग्रेडेबल होते हैं. यह सीवर से बहकर सागरों और महासागरों में पहुंच जाते हैं और पर्यावरण में ‘प्लास्टिक सूप’ (Plastic soup) के बहुत बड़े भाग का अंश बन जाते हैं.
  • यह जल प्रदूषण में वृद्धि करते हैं और इनमें जलीय पारिस्थितिकी तंत्र में व्यवधान उत्पन्न करने की क्षमता होती है.
  • एक बार जल निकायों में प्रवेश करने के उपरांत यह संचित हो जाते हैं और अन्य प्रदूषकों के लिए वाहक के रूप में कार्य करते हैं. यह खाद्य श्रृंखला में कैंसरकारी रासायनिक यौगिकों का वहन करते हैं.
  • अपने छोटे आकार के कारण यह अपशिष्ट जल उपचार निस्यंदन प्रणाली(Waste water treatment filtration system) से भी पार हो जाते हैं.

 

पर्यावरण संबंधित महत्वपूर्ण समझौते



मांट्रियल प्रोटोकॉल, 1987: मांट्रियल प्रोटोकॉल का उद्देश्य वर्ष 1990 तक क्लोरो फ्लोरो कार्बन के उत्पादन एवं 
उनके इस्तेमाल को 1986 के स्तर तक लाना था।
हेलसिंकी घोषणा (1989): हेलसिंकी घोषणा, ओजोन परत पर ग्रीन हाउस गैसों के दुष्प्रभाव को लेकर की गई थी।
 इसमें क्लोरो फ्लोरो कार्बन के उपभोगों को 2000 तक समाप्त करने की बात कही गई।
लंदन सम्मेलन (1990): विकसित एवं विकासशील देशों द्वारा आयोजित किए गए इस सम्मेलन में कार्बन उत्पादन
 को खत्म करने के लिए क्रमश: 2000 तथा वर्ष 2010 तक का लक्ष्य निर्धारित किया गया।
रियो पृथ्वी सम्मेलन (1992): पर्यावरण के तापमान के स्तर में लगातार हो रही वृद्धि को देखते हुए इससे संबंधित
 उपायों का प्रस्ताव रियो पृथ्वी सम्मेलन में किया गया।
कोपेनहेगन सम्मेलन 1992: इस सम्मेलन में यह माना गया कि ग्लोबल वार्मिग का मुख्य कारण हानिकारक गैसों
 का उत्सर्जन है। अत: इन गैसों में कार्बन ट्रेटा क्लोराइड 1996 तक, सी.एफ.सी. 1996, हाइड्रो क्लोरोफ्लोरो 
वर्ष 2030 तक एवं वर्ष 2000 तक हैलोन्स गैसको पूर्णतः समाप्त किया जाना तय हुआ था।
नैरोबी सम्मेलन: जलवायु परिवर्तन के मुद्दे को लेकर संयुक्त राष्ट्र द्वारा आयोजित 12वां सम्मेलन नैरोबी में हुआ,
 जिसमें विश्व के 189 सदस्य देशों ने भाग लिया। इसी बैठक में दिसंबर 2007 में बाली में भी एक जलवायु सम्मेलन
 बुलाने का प्रस्ताव किया गया था। 
विश्व जलवायु सम्मेलन: संयुक्त राष्ट्र के नेतृत्व में 3-15 दिसंबर, 2007 तक इंडोनेशिया के बाली द्वीप में स्थित
 नूसादुआ में विश्व जलवायु सम्मेलन आयोजित किया गया।
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