हिंदी साहित्य में आलोचना का विकास । प्रमुख आलोचक ( आलोचनाकार ) और उनकी रचना


प्रमुख आलोचक ( आलोचनाकार ) और उनकी रचना 

आलोचना और आलोचक



 हिंदी साहित्य में आलोचना का विकास

 

  • आधुनिक हिंदी साहित्य गद्य के जनक एवं पालनकर्ता महान साहित्यकार भारतेंदु हरिश्चन्द्र ने हिंदी साहित्य के सभी उपेक्षित अंगों को विकसित किया। अतः आलोचना साहित्य भी उनके युग परिवर्तन कारी दृष्टि से कैसे ओझल हो सकता था। संस्कृत के प्रथम आचार्य भरत मुनि ने नाट्य शास्त्र लिखा है।


हिंदी का प्रथम आलोचना ग्रंथ

 

  • भारतेंदु हरिश्चन्द्र ने नाटक लिखा है। भारतेंदु आधुनिक हिंदी आलोचना के जन्मदाता एवं नाटक प्रथम आलोचना ग्रंथ हैं। डॉ. श्याम सुंदर दास ने भाषाशैली को दष्टिगत रखते हुए यह भ्रामक धारणा बना ली कि नाटक भारतेंदु की रचना नहीं है। इसका प्रमुख कारण नाटक की भाषा नहीं अपितु डॉ. श्याम सुंदर दास की रचना रूपक रहस्य है। यह उसी का रहस्य प्रतीत होता है कि कहीं उसकी महत्ता में कभी न आ जाए इसलिए यह घोषित करना श्रेयस्कर है कि नाटक भारतेंदु हरिश्चन्द्र की रचना नहीं है।

 

  • नाटक की भूमिका तथा समर्पण यह प्रमाणित करते हैं कि नाटक भारतेंदु की रचना है। क्यांकि विषयानुसार लेखक की शैली में परिवर्तन होना स्वाभाविक है। भूमिका एवं समर्पण में भारतेंदु ने स्पष्ट लिखा है "आशा है कि सज्जनगण गुण मात्र ग्रहण करके मेरा श्रम सफल करेंगे।"

 

इस ग्रंथ को हरिश्चन्द्र ने अपने इष्ट देव को प्रेम पूर्वक समर्पित करते हुए लिखा है-

 

  • "नाथ ! आज एक सप्ताह होता कि मेरे इस मनुष्य जीवन का अंतिम अंक हो चुका.....नहीं तो यह ग्रंथ प्रकाश भी न होने पाता.......जब प्रकाश होता तो समर्पण भी होना आवश्यक है। अतएव अपनाए हुए की वस्तु समझकर अंगीकार कीजिए।" 'कवि बचन सुधा' में 'हिंदी कविता' नामक भारतेंदु का प्रथम आलोचनात्मक निबंध प्रकाशित हुआ।

 

भारतेंदु युग के प्रमुख आलोचनाकार 

 

भारतेंदु युग के प्रमुख आलोचनाकार बदरी नारायण चौधरी 'प्रेमघन', बालकृष्ण भट्ट, श्री निवास दास, आदि के नाम उल्लेखनीय हैं।

 

भारतेंदु हरिश्चंद्र

 

  • भारतेंदु हरिश्चंद्र हिंदी साहित्य के सर्व प्रथम आलोचना लेखक हैं यदि संस्कृत में भरत मुनि ने सर्वप्रथम नाट्यशास्त्र की रचना की तो हिंदी में सर्वप्रथम आलोचना ग्रंथ नाटक इन्होंने लिखा है। यह अत्यंत प्रौढ़ रचना है जिसमें प्राचीन भारतीय नाट्यशास्त्र एवं आधुनिक पाश्चात्य नाट्यशास्त्र एवं आलोचना साहित्य का सुंदर समन्वय किया गया है। तत्कालीन हिंदी नाटककारों के लिए नियम निर्धारण किया गया है जिनमें स्थान-स्थान पर लेखक की मौलिक उद्भावनाएं भी प्रकट हुई हैं। नाटक के भेदों का विवेचन करते हुए तत्कालीन सभी नाटकों, कठपुतली वालों, शहरों के तमाशों, पारसियों के नाटक आदि पर दष्टि डालते हुए युग का मार्ग दर्शन किया गया है।

 

  • नाटक की अर्थ प्रकृतियों, संधियों आदि की घोषणा करते हुए उन्होंने लिखा है - "संस्कृत नाटक की भांति हिंदी नाटकों में इनका अनुसंधान करना या किसी नाटकांग में इनको यत्नपूर्वक रखकर हिंदी नाटक लिखना व्यर्थ है।"

 

  • इससे स्पष्ट हो जाता है कि भारतेंदु में केवल अनुवाद करने की क्षमता एवं सामर्थ्य ही नहीं थी अपितु वे प्राचीन नाट्यशास्त्र को सर्वथा नवीन रूप देने में भी पूर्णतः समर्थ थे। नाटक में सामान्य सिद्धान्तों का प्रतिपादन करके संस्कृत, हिंदी एवं यूरोप के नाटक- साहित्य के विकास को प्रदर्शित किया गया है। साथ-साथ अपने समसामयिक नाटकों की आलोचना भी की है। 


व्यावहारिक आलोचना करते हुए तीखी व्यंग्यात्मकता से नहीं चूकते हैं। पारसी नाटकों की आलोचना करते हुए उन्होंने लिखा है- 

 

  • "काशी में पारसी नाटक वालों ने नाचघर में जब शकुंतला नाटक खेता और उसमें धीरोदात्त नायक दुष्यंत खेमटे वालियों की तरह कमपर हाथ रखकर मटक-मटक कर नाचने और पतरी कमर बल खाय यह गाने लगा तब डॉक्टर थिबो, बाबू प्रमादादास मित्र प्रभति विद्वान यह कहकर उठ आए कि अब देखा नहीं जाता। ये लोग कालिदास के गले पर छूरी फेर रहे हैं। यही दशा बुरे अनुवादों की होती है। बिना पूर्व कवि के हृदय से हृदय मिलाए अनुवाद करना शुद्ध झख मारना ही नहीं, कवि की लोकांतर स्थिति आत्मा को नरक कष्ट देना है।"

 

बदरी नारायण चौधरी 'प्रेमधन'

 

  • बदरी नारायण चौधरी ने भारतेंदु की 'नाटक' रचना के समय अपनी आनंद कादंबिनी पत्रिका में संयोगिता स्वयंवर तथा बंग विजेता पुस्तकों की विस्त नोचना की।

 

बालकृष्ण भट्ट

 

  • बालकृष्ण भट्ट ने हिंदी प्रदीप पत्रिका निकाली जिसमें उन्होंने सच्ची आलोचना स्तंभ में संयोगिता स्वयंवर की आलोचना की। भारतेंदु द्वारा प्रवर्तित आलोचना कार्य को अग्रसर करने का श्रेय बालकृष्ण भट्ट को है। संयोगिता स्वयंवर लाल श्री निवास दास द्वारा लिखा गया ऐतिहासिक नाटक था इससे स्पष्ट हो जाता है कि सैद्धान्तिक आलोचना की तरह व्यावहारिक आलोचना के क्षेत्र में भी प्राथमिकता नाटक को ही मिली।

 

  • भट्ट एवं प्रेमधन की आलोचनाओं में समीक्षा का विकसित रूप दष्टिगोचर होता है। कहीं-कहीं उनमें तीक्ष्ण व्यंग्यात्मकता का भी सन्निवेश हो गया है। भट्ट की शैली में भावात्मकता, आत्मानुभूति तथा लेखन को सीधा संबोधित करने की प्रवृत्ति दिखाई पड़ती है. 

 

  • "लालाजी यदि बुरा न मानिए तो एक बात आपसे धीरे से पूंछे, वह यह कि आप ऐतिहासिक नाटक किसे कहेंगे।" प्रेमधन की शैली में भट्ट जैसी सरसता एवं व्यंग्यात्कमता तो नहीं मिलती है किन्तु गंभीरता अधिक है।

 

गंगा प्रसाद अग्निहोत्री 

  • समालोचना सन् 1896 ई.

 

अंबिका दत्त व्यास 

  • गद्य काव्य मीमांसा ।

 

द्विवेदी युग के आलोचनाकार 

 

महावीर प्रसाद द्विवेदी

 

सन् 1900 ई. में सरस्वती के संपादक के रूप में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का हिंदी आलोचना साहित्य में आगमन हुआ। महावीर प्रसाद द्विवेदी ने "कालिदास की निरंकुशता", "नैषध चरित्र चर्चा" तथा 'विक्रमांक देव चरित चर्चा' आदि ग्रंथों की रचना की। उन्होंने अपने ग्रंथों में पुराने नए कवियों के गुण दोषों का विवेचन व्यंग्यात्मक शैली में किया है। द्विवेदी मूलतः शिक्षक,

  • संशोधक एवं सुधारक आचार्य थे। उन्होंने अपनी आलोचनाओं के माध्यम से हिंदी काव्य को श्रंगारिकता के दलदल से बाहर निकालकर उसे देश प्रेम और समाज सुधार की भावनाओं से अनुप्राणित कर दिया। ब्रज भाषा का स्थानापन्न खड़ी बोली को बनाने का श्रेय उन्हीं को है। द्विवेदी की शैली में सरसता, सरलता तथा व्यंग्यात्मकता विद्यमान है।

 

गंगा प्रसाद अग्निहोत्री -समालोचना। 

पदुम लाल पन्ना लाल बख्शी-विश्व साहित्य 

गणेश बिहारी मिश्र 

श्याम बिहारी मिश्र 

शुकदेव बिहारी मिश्र

 

मिश्र बंधु

 

  • महावीर प्रसाद द्विवेदी के पश्चात् हिंदी आलोचना के क्षेत्र में मिश्र बंधुओं का प्रवेश हुआ। उन्होंने हिंदी नवरत्न एवं मिश्र बंधु विनोद की रचना की हिंदी नवरत्न में हिंदी कवियों को श्रेणीबद्ध करके उसके विभाग बनाए गए हैं। देव को बिहारी से बड़ा प्रमाणित किया गया है। देव को बड़ा बनाने के लिए इन्होंने बिहारी के दोहा में छिद्रांवेषण किया है। उनके अनेक दोष ढूंढ निकाले हैं।

 

पद्म सिंह शर्मा 'कमलेश'

 

  • बिहारी पर किए गए आक्रमण एवं बिहारी सतसई में दोष दर्शन के निरूपण को कमला नहीं सह सके। फलस्वरूप उन्होंने बिहारी  सतसई की भूमिका लिखी जिसमें चमत्कारिक ढंग से बिहारी की उत्कृष्टता का प्रतिपादन किया जिसके परिणामस्वरूप देव और बिहारी को विवाद का विषय बना दिया गया।

 

पं. कृष्ण बिहारी मिश्र

 

  • पं. कृष्ण बिहारी मिश्र ने देव और बिहारी की रचना की जिसमें दोनों कवियों के काव्य की तुलना में संयमित एवं मार्मिक शैली का प्रतिपादन किया। कहीं कहीं उन्होंने बिहारी पर आक्षेप भी किए।

 

लाला भगवान दीन 'दीन'

 

  • भगवान दीन को बिहारी पर किए गए कृष्ण बिहारी मिश्र के आक्षेप उचित प्रतीत नहीं हुए उसके प्रतिउत्तर में लाला जी ने बिहारी और देव की रचना की इन तुलनात्मक रचनाओं में बिहारी देव दोनों में से किसी एक की श्रेष्ठता का प्रतिपादन किया गया है। हिंदी नवरत्न देव, पद्म सिंह बिहारी, कृष्ण बिहारी मिश्र देव तथा लाला भगवान दीन में बिहारी की श्रेष्ठता का आग्रह किया है। इसी प्रकार का विवाद भक्तिकालीन कवियों तुलसी सूर को लेकर सूरसूर, तुलसी राशी या सूर शशी तुलसी रवि खूब चल था। आगे लकर बड़ा छोटा सिद्ध करने का झगड़ा शांत हो गया।

 

  • उपर्युक्त आलोचकों के अतिरिक्त द्विवेदी युग में सैद्धान्तिक आलोचना को व्यवस्थित एवं क्रमबद्ध स्वरूप प्रदान करने वाले आलोचकों में बाबू श्याम सुंदर दास तथा पदुम लाल पुन्ना लाल बख्शी उल्लेखनीय हैं। गंगा प्रसाद अग्निहोत्री ने नागरी प्रचारिणी पत्रिका में समालोचना नामक निबंध के द्वारा सैद्धान्तिक आलोचना का श्रीगणेश कर दिया था। बाबू श्याम सुंदर दास ने साहित्यालोचन के माध्यम से उसे प्रौढ़ता प्रदान की। इसके अतिरिक्त श्याम सुंदर दास ने रूपक रहस्य, भारतीय नाट्यशास्त्र भाषा रहस्य तथा हिंदी भाषा और साहित्य अनेक आलोचनात्मक ग्रंथों का प्रणयन किया। पदमु लाल पुन्ना लाल बख्शी ने विश्व साहित्य की रचना कर बाबू श्याम सुंदर दास की परंपरा अग्रसर करने में महत्वपूर्ण योगदान किया।

 

शुक्ल युग आलोचनाकार 

 

  • आचार्य राम चन्द्र शुक्ल के आलोचना क्षेत्र में आगमन से पूर्व हिंदी आलोचना में तुलसीदास आलोचना का प्रसार प्रचार था जिसके सामने न कोई विशेष आदर्श था और न ही कोई विशेष सिद्धान्त अपितु बड़ा-छोटा प्रमाणित करने का आग्रह था। अपनी-अपनी रूचि के अनुसार अपने अपने ढंग से जिसे चाहें बड़ा सिद्ध करने का प्रयत्न चल रहा था किंतु आचार्य रामचन्द्र शुक्ल साहित्य का एक सुनिश्चित व्यवस्थित एवं आलोचना की एक विकसित पद्धति लेकर अवतरित हुए। उन्होंने स्थूल व्यक्तिकता के लाभ-हानि के प्रश्न को त्यागकर साहित्य की सूक्ष्म शक्ति भावना एवं अनुभव को साहित्य की कसौटी के रूप में अपनाया। साहित्य में सौंदर्य को महत्ता प्रदान की।

 

आचार्य रामचंद्र शुक्ल

 

  • आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने समाज हितैषिता को साहित्य का साध्य तो नहीं माना है किंतु एक ऐसे साधन के रूप में स्वीकार करते हैं, जो साहित्य को व्यापकता प्रदान करता है। वास्तव में शुक्ल ने कला कला के लिए एवं कला जीवन के लिए दोनों में अपूर्व सामंजस्य स्थापित किया है। आचार्य शुक्ल ने यद्यपि द्विवेदी युगीन पष्ठभूमि पर आलोचना का श्रीगणेश किया है फिर भी उन्होंने उसे जितना उन्नत रूप प्रदान किया है उससे उन्हें युग आलोचना जगत का आलोक स्तंभ कहा जाए तो अत्युक्ति न होगी।

 

आचार्य शुक्ल की आलोचना के तीन रूप हैं 


  1. सैद्धान्तिक- चिंता मणि दो भाग, रसमीमांसा सैद्धान्तिक आलोचना के अंतर्गत आते हैं। 
  2. ऐतिहासिक - हिंदी साहित्य का इतिहास ऐतिहासिक आलोचना में आता है। 
  3. व्यावहारिक- 


  • तुलसी ग्रंथावली, सूरदास का भ्रमरगीत सार तथा जायसी ग्रंथावली आदि की भूमिकाएं व्यावहारिक आलोचना के अंतर्गत आती हैं। रस मीमांसा के माध्यम से एक ओर उन्होंने भारतीय काव्यशास्त्र के विषय में अपनी सूक्षम पकड़, गंभीर दष्टि तथा व्यापकता का परिचय दिया है तो दूसरी ओर भ्रमरगीत सार तुलसी ग्रंथावली तथा जायसी ग्रंथावली आदि की सर्वागीण भूमिकाएं लिखकर व्यावहारिक आलोचना का सुंदर स्वरूप प्रस्तुत किया है। हिंदी साहित्य का इतिहास ऐतिहासिक आलोचना का मानदंड बन गया है। हिंदी साहित्य के परवर्ती आलोचकों ने उनके द्वारा प्रतिपादित  आदर्शों एवं सिद्धान्तों को उदारता से स्वीकार किया है।

 

  • आचार्य शुक्ल ने हिंदी आलाचेना को प्रौढ़ता प्रदान की। उन्होंने हिंदी उच्च काव्य भावना के बल पर आलोचन शैली का निर्धारण किया है। शुक्ल ने अपने व्यापक, गंभीर अध्ययन, काव्य गुणों को पहचानने की अद्भुत क्षमता एवं विश्लेषणात्मक बौद्धिकता से हिंदी आलोचना साहित्य को अपूर्व उत्कर्षता प्रदान की।

 

  • शुक्ल ने प्रथम बार रस- विवेचना को मनोवैज्ञानिक आधार प्रदान किया। रस- विवेचन में शक्त ने मौलिक रूप से रसादि की पुनर्व्यवस्था की। क्रोचे के अभिव्यंजनावाद की कुतक के वक्रोक्तिवाद से तलना करके उसे भारतीय वक्रोक्तिवाद का विलायती उत्थान स्वीकारना उनके अध्ययन की गहराई का द्योतन करता है। हिंदी की सैद्धान्तिक आलोचना परिचय और सामान्य विवेचन के धरातल से ऊपर उठाकर उसे गंभीर स्वरूप प्रदान करने का श्रेय शुक्ल को है। शुक्ल की शैली प्रौढ़, गंभीर, सूक्ष्म, सरस और प्रवाहपूर्ण है। जिसके परिणामस्वरूप पाठक उनकी बात को मानने के लिए बाध्य हो जाता है। आज हिंदी में दिखलाई पड़ने वाली समस्त आलोचना प्रणालियों का उद्गम शुक्ल की आलोचना पद्धति है।

 

  • शुक्ल के समकालीन अन्य आलोचकों में डॉ. श्याम सुंदर दास, डॉ. विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, बाबू गुलाब राय, कृष्ण शंकर शुक्ल, परशुराम चतुर्वेदी, चंद्रबली पांडेय पीतांबर दत्त वड्थ्वाल, तथा डॉ. रमा शंकर शुक्ल रसाल आदि उल्लेखनीय हैं।

 

पं. कृष्ण शंकर शुक्ल 

  • केशव की काव्य कला के द्वारा शुक्ल के व्यावहारिक आलोचना के मानदंडों की रक्षा की।

 

बाबू गुलाब राय 

  • बाबू गुलाब राय ने सिद्धांत और अध्ययन तथा काव्य के रूप जैसी महत्वपूर्ण कृतियां हिंदी आलोचना साहित्य को प्रदान की।

 

पीतांबर दत्त बड़थ्वाल

 

  • हिंदी काव्य में निर्गुण संप्रदाय ।

 

पं. परशु राम चतुर्वेदी- उत्तरी भारत की संत परंपरा

 

विश्वनाथ प्रसाद मिश्र- हिंदी साहित्य का अतीत तथा बिहारी

 

शुक्लोत्तर आलोचक 

शुक्ल के परवर्ती आलोचकों को छायावादी आलोचक की संज्ञा भी दी जाती है। जिसमें प्रमुख प्रसाद, पंत, निराला, एवं महादेवी हैं। इनके अलावा नंद दुलारे वाजपेयी, शांति प्रिय द्विवेदी, डॉ. नगेंद्र, डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी, गंगा प्रसाद पांडेय, डॉ. देवराज, डॉ. केशरी नारायण शुल्क तथा श्रीपाल सिंह क्षेम' आदि प्रमुख हैं।

 

  • जयशंकर प्रसाद 
  • सुमित्रानंदन पंत 
  • सूर्यकांत त्रिपाठी, निराला

 

महादेवी वर्मा

 

  • छायावादी कवियों एवं कवयित्री आदि ने अपने काव्य ग्रन्थों की भूमिका के रूप में आलोचनाएं लिखी हैं जिनसे छायावादी आलोचना का श्री गणेश हुआ है। इनकी आलोचना में तीव्र जीवनानुभूति, सूक्ष्म सौंदर्य, चेतना, रमनीय कोमल कल्पना, अनुभूति प्रेरित रहस्यभावना, स्निग्ध शैली शिल्प, विशेषण विपर्यय, वीकरण, शब्द संगीत ही इस साहित्य चिंतन के केन्द्र बिंदु हैं। अनुमूल्यात्मक सौंदर्यवाद से उन्हें अभिहित किया जा सकता है।

 

आचार्य नंद दुलारे वाजपेयी

 

  • आचार्य नंद दुलारे वाजपेयी छायावाद और उसकी काव्य शैली के समर्थ व्याख्याता होने के नाते सौष्ठववादी आलोचक के रूप में माने जाते हैं। उन्होंने साहित्य का मूल्यांकन नैतिकवादी फार्मूले पर नहीं किया है। वाजपेयी की महत्वपूर्ण आलोचनात्मक कृतियों में महाकवि सूरदास जयशंकर प्रसाद, हिंदी साहित्य बीसवीं शताब्दी तथा आधुनिक हिंदी साहित्य है।

 

शांतिप्रिय द्विवेदी 

  • द्विवेदी का संबंध प्रभाववादी आलोचना से है। किन्तु उन्होंने भावनात्मक ढंग से ही सही हिंदी की छायावादी समीक्षा को संवर्द्धित किया है। सामयिकी, संचारिणी तथा ज्योति विहंग इनकी श्रेष्ठ कृतियां हैं।

 

डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी 

  • आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की आलोचना पद्धति संतों के जीवनादर्श, रवींद्र के मानवतावाद तथा सांस्कृतिक समाज शास्त्रीय दष्टि से प्रभावित है। हिंदी साहित्य की भूमिका, कबीर, सूर साहित्य, साहित्य सहचर तथा हिंदी साहित्य का आदि काल इनकी आलोचनात्मक कृतियों में विशेष उल्लेखनीय हैं।

 

डॉ. नगेंद्र 

  • डॉ. नगेंद्र सैद्धान्तिक आलोचना की पष्ठभूमि को लेकर छायावाद के काव्य वैभव का साक्षात्कार करने वाले समर्थ समीक्षक थे। सुमित्रानंदन पंत, साकेत एक अध्ययन, रीति काव्य की भूमिका विचार और विश्लेषण, रस सिद्धान्त, कामायनी के अध्ययन की समस्याएं, आधुनिक हिंदी कविता की मुख्य प्रवत्तियां तथा अरस्तू का काव्य शास्त्र आदि प्रमुख आलोचना ग्रंथ हैं। 

डॉ. राम कुमार वर्मा 

  • डॉ. राम कुमार वर्मा ने हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास लिखा है। आदिकाल एवं भक्ति काल का विस्तृत विवेचन किया गया है। अनेक कवियों का मूल्यांकन साहित्यिक शैली में किया गया है। 

डॉ. भगीरथ मिश्र 

  • डॉ. भगीरथ मिश्र ने हिंदी काव्य शास्त्र का इतिहास तथा हिंदी साहित्य उद्भव और विकास लिखा है।


स्वातंत्र्योत्तर युग आलोचक 

 

  • शुक्ल युग में आलोचना अनेक धाराओं में विभक्त होकर चलने लगी जिनमें ऐतिहासिक, सैद्धान्तिक, व्यावहारिक, मनोविश्लेषणवादी एवं वैज्ञानिक अथवा प्रगतिवादी, प्रभाववादी, अंतश्चेतनावादी, शास्त्रीय तथा शोध-अनुसंधान परक आलोचना के अनेक रूप हुए हैं। आलोचकों ने विवेचन इसी आधार पर किया है जो उचित प्रतीत नहीं होता है। इसलिए शुक्लोत्तर युग के पश्चात् स्वातंत्र्योत्तर युग को अति लंग व खींचकर सन् 1960 के बाद की आलोचना को साठोत्तरी आलोचना युग से विवेचन उचित माना है।

 

  • प्रगतिवादी आलोचना सन् 1936 ई. के प्रगतिशील लेखक सम्मेलन के पश्चात् ही प्रारंभ हो गई थी जो सन् 1947 ई. तक चलती रही। इस युग के आलोचकों में शिवदान सिंह चौहान, रामविलास सिंह प्रकाश चन्द्र गुप्त तथा नामवर सिंह आदि हैं।

 

शिवदान सिंह चौहान- प्रगतिवाद ।

रामविलास शर्मा- भारतेंदु, प्रेमचंद, निराला तथा रामचन्द्र शुक्ल आदि आलोचनाएं प्रमुख हैं। 

नामवर सिंह- नामवर सिंह ने इतिहास और आलोचना तथा कविता के नए प्रतिमान की रचना करके आलोचना को नया मोड़ दिया। 

रांगेय राघव- रांगेय राघव ने आधुनिक कविता में विषय और शैली की रचना की। इस युग के अन्य आलोचक डॉ. मैनेजर पांडेय एवं चंचल चौहान हैं।

 

साठोत्तरी युग आलोचक 

 

  • सन् 1960 ई. के बाद आलोचना ने नवीन मोड़ लिया। इस युग के आलोचकों में पं. शांतिप्रिय द्विवेदी, भगवत शरण उपाध्याय, डॉ. राम स्वरूप चतुर्वेदी, इलाचन्द्र जोशी, डॉ. नगेन्द्र, अज्ञेय, डॉ. देवराज उपाध्याय, परशुराम चतुर्वेदी, पं. विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, डॉ. राम चन्द्र तिवारी, सीताराम चतुर्वेदी, लक्ष्मीनारायण सुधांशु, रवींद्र सहाय वर्मा, डॉ. आनंद प्रकाश दीक्षित डॉ. राममूर्ति त्रिपाठी आदि के नाम उल्लेखनीय हैं।

 

  • शांतिप्रिय द्विवेदी - पं. शांतिप्रिय द्विवेदी प्रभाववादी आलोचक हैं।

 

भगवत शरण उपाध्याय

 

  • प्रभाववादी आलोचकों में उपाध्याय का नाम प्रमुख है। इन्होंने गुरुभक्त सिंह की नूरजहां में अपना मत व्यक्त करते हुए लिखा है 
  • मैं प्रभाववादी हूं। जब अनुकूल प्रभाव का स्पर्श होता है, तब प्रभाववादी चुप नहीं बैठ सकता है।"

 

इलाचंद्र जोशी

 

  • इलाचंद्र जोशी अंतश्चेतनावादी आलोचक हैं। इस आलोचना का सूत्रपात करने का श्रेय इन्हीं को है। इस आलोचना का मूल उत्स फ्रायड का अंतश्चेतनावादी कला सिद्धान्त है। फ्रायड के अनुसार काव्य कला दमित कामवासना की कल्पित अभिव्यक्ति होती है। अंतश्चेतनावादी आलोचक साहित्यकार के वैयक्तिक जीवन के गहन अध्ययन के आधार पर उनकी इन्हीं दमित वासनाओं का विवेचन एवं विश्लेषण करता है। इलाचन्द्र जोशी की साहित्य सर्जना, विवेचना, विश्लेषण तथा देखा परखा आदि कृतियों में उनका दष्टिकोण स्पष्ट हो गया है। इसके अतिरिक्त डॉ. नगेंद्र, सच्चिदानंद हीरा नंद वात्स्यायन अज्ञेय, डॉ. देवराज उपाध्याय आदि ने इस दिशा में महत्वपूर्ण योगदान किया है।

 

  • ऐतिहासिक आलोचना के क्षेत्र में कार्य करने वाले आलोचकों में हजारीप्रसाद द्विवेदी, परशुराम चतुर्वेदी, पं. विश्व नाथ प्रसाद मिश्र तथा रामचन्द्र तिवारी के नाम उल्लेखनीय हैं। इस आलोचना के अंतर्गत इतिहास एवं संस्कृति की विशाल परिस्थितियों में साहित्यकार की रचना का मूल्यांकन किया जाता है। डॉ. राम चन्द्र तिवारी की रीति कालीन हिंदी कविता और सेनापति, मध्य कालीन काव्य साधना हिंदी का गद्य साहित्य तथा कबीर मीमांसा आदि ऐतिहासिक आलोचना की रचनाएं हैं। शास्त्रीय आलोचकों में डॉ. राम चन्द्र तिवारी का नाम प्रमुख है। 

 

लक्ष्मीनारायण सुधांशु -'जीवन के तत्व और काव्य के सिद्धांत। 

डॉ. राम कुमार वर्मा- 'साहित्य शास्त्र ।' 

डॉ. भगीरथ मिश्र-'काव्यशास्त्र ।' 

सीताराम चतुर्वेदी-'समीक्षा शास्त्र ।' 

लीलाधर गुप्त- 'पाश्चात्य साहित्यालोचन के सिद्धान्त ।' 

डॉ. देवराज-रोमांटिक साहित्य शास्त्र | 

रवींद्र सहाय वर्मा-'पाश्चात्य साहित्यालोचन और हिंदी पर उसका प्रभाव।" 


डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी -

  • चतुर्वेदी हिंदी अनुशीलन के संपादक भी रहे हैं इनकी रचनाओं में नए पत्ते', 'नई कविता', 'क ख ग', 'हिंदी नव लेखन', 'आगरा जिले की बोली', 'भाषा और संवेदना', 'अज्ञेय और आधुनिक रचना की समस्या', 'हिंदी साहित्य की अधुनातन प्रवत्तियां, 'कामायनी का पुनर्मूल्यांकन', 'मध्यकालीन हिंदी काव्य भाषा', 'हिंदी काव्य एक साक्ष्य', 'कविता यात्रा', 'गद्य की सत्ता', 'सजन और भाषिक संरचना, इतिहास और आलोचना दष्टि', 'हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास', 'काव्य भाषा पर तीन निबंध, 'प्रसाद', 'निराला', 'अज्ञेय' साहित्य के नए दायित्व' कविता का पक्ष समकालीन हिंदी साहित्य विविध परिदश्य, हिंदी गद्य विन्यास और विकास तथा 'तारसप्तक' से गद्य कविता आदि विशेष उल्लेखनीय हैं।

 

आनंद प्रकाश- दीक्षित-रस सिद्धान्त का स्वरूप विश्लेषण 

डॉ. राममूर्ति त्रिपाठी- 'रस विमर्श' । आदि प्रमुख शास्त्रीय आलोचना के लेखक उनकी कृति है। 


  • शोध अनुसंधान आलोचना का विगत कुछ वर्षों से अत्यधिक विकास हुआ है।

 

  • डॉ. माता प्रसाद गुप्त ने पाठालोचन की पद्धति का उपयोग करते हुए वीसल देव रास', 'पद्मावत', 'चंदायन' तथा 'मगावती' आदि का पाठ शोधन किया। डॉ. दीन दयाल गुप्त अष्ट छाप और बल्लभ संप्रदाय, डॉ. राजपति दीक्षित तुलसीदास और उनका युग, डॉ. विजय पाल सिंह केशव और उनका काव्य', डॉ. सरयू प्रसाद अग्रवाल अकबरी दरबार के हिंदी कवि', डॉ. आनंद प्रकाश दीक्षित रस सिद्धांत स्वरूप मीमांसा, डॉ. हीरा लाल माहेश्वरी- राजस्थानी भाषा और साहित्य', आदि। 

 

  • पी.एच.डी. एवं डी. दि. उपाधि हेतु लिखे गए शोध प्रबंध हैं। ऐसे शोध प्रबंधों की वर्तमान समय में गणना करना भी कष्ट साध्य, श्रमसाध्य एवं असंभव कार्य हो गया है। शोध प्रबंध की ऐतिहासिकता अवलोकन करने से ज्ञात होता है कि हिंदी का प्रथम शोध प्रबंध भारत में नहीं अपितु इटली में एल. पी. टेसीटरी द्वारा लिखा गया जिसका अनुवाद डॉ. राधि प्रसाद त्रिपाठी ने रामचरितमानस और बाल्मीकि रामायण के नाम से किया।

 

  • भारत वर्ष में हिंदी का प्रथम शोध प्रबंध हिंदी काव्य में निर्गुण संप्रदाय पीतांबर दत्त बड़थ्वाल के द्वारा सन् 1934 ई. में काशी हिंदी विश्व विद्यालय वाराणसी में उपाधि हेतु प्रस्तुत किया गया। नई कविता ने नई समीक्षा को जन्म दिया। हिंदी आलोचना साहित्य के विकास में लहर, 'नई धारा', 'साहित्य संदेश', 'कल्पना', 'आलोचना' तथा 'माध्यम' आदि पत्रिकाओं . का विशेष योगदान रहा है। वास्तव में हिंदी आलोचना सर्व भावेन विकसित एवं प्रौढ़ है। आलोचना के क्षेत्र में आचार्यों एवं प्रध्यापकों का योगदान अविस्मरणीय है। आलोचना का भविष्य अति उज्जवल है। 

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