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स्वतंत्रता के पश्चात् मध्यप्रदेश ( MP after Independence)

स्वतंत्रता के पूर्व देश के दूसरे क्षेत्रों की तरह आज के मध्यप्रदेश के तौर पर जाने वाला भू-भाग रियायती एवं ब्रिटिश शासन के अधीन प्रशासित था। स्वतंत्रता के पश्चात् इसी आधार पर राज्यों का निर्माण हुआ। सबसे पहले भाग-ए प्रांत थे, जिसमें ब्रिटिश भारत के सारे सूबे शामिल थे। फिर भाग-बी राज्य थे, जिसमें देशी रियासतों को मिलाकर बनाए गए प्रांत आते थे। फिर भाग-सी के राज्य थे जिन पर केन्द्र पर शासन होता था। इस तरह देश की आजादी के बाद आज के मध्य प्रदेश भू-भाग को समेटने वाले क्षेत्रों में चार राज्य भोपाल, मध्य भारत, विंध्य प्रदेश और विंध्य प्रदेश अस्तित्व में आए। इनमें भोपाल भाग-सी राज्य था, मध्य  भारत भाग-बी राज्य था और मध्य प्रदेश और विंध्य प्रदेश (पुराना) भाग-ए राज्य था। 1 जनवरी, 1950 को विंध्य प्रदेश को भाग -सी राज्य का का दर्जा दिया गया। ये राज्य और उनकी राजधानियाँ इस प्रकार थीं:
राज्य- राजधानी
  • भोपाल (भाग-सी राज्य) - भोपाल
  • मध्य भारत (भाग-बी राज्य) - इंदौर, ग्वालियर
  • विंध्य प्रदेश (भाग-सी राज्य) - रीवा
  • मध्य प्रदेश (पुराना) (भाग-ए राज्य) - नागपुर
  • भोपाल राज्य अंग्रेजों के भारत छोड़ने पर भोपाल केन्द्र शासित राज्य हो गया। 1 जून, 1949 को भारत सरकार ने इसे अपने अधीन कर लिया। श्री एन.बी.बैनर्जी यहाँ के मुख्य आयुक्त नियुक्त हुए। 1952 को प्रजा द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियों ने भोपाल का शासन सूत्र संभाला मुख्यमंत्री डॉ. शंकरदयाल शर्मा बने। भोपाल राज्य रायसेन व सीहोर दो जिलों में विभाजित था।

मध्य भारत


  •  स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् हुए 600 राज्यों के एकीकरण में मध्यभारत भी था। 22 अप्रैल, 1948 को इस प्रदेश की 22 रियासतों के नरेशों ने इस अनुबंध पर हस्ताक्षर किए। ग्वालियर व इंदौर को संयुक्त रूप से राजधानी बनाया गया। साढ़े छह माह ग्वालियर व साढ़े पाँच माह इंदौर राजधानी। 1948-46 की अवधि में मध्य भारत राज्य का प्रशासन निर्वाचित मंत्रिमण्डल द्वारा किया जाता रहा। प्रथम निर्वाचित मंत्रिमण्डल के प्रधान लीलाधर जोशी थे। राज्यों के पुनर्गठन के समय तखतमल जैन मुख्यमंत्री थे (1956)। मध्य भारत में ग्वालियर व इंदौर में उच्च कोटि के हवाई अड्डे थे। 26 जुलाई, 1984 को इंदौर से ग्वालियर, दिल्ली और मुंबबई के लिए विमान सेवाएँ प्रारंभ की गई थी। माधव सागर (तिगरा-ग्वालियर) जलयान के लिए उपयोगी स्टेशन था। मध्य भारत का समृद्ध तथा उन्नत प्रदेश, सांस्कृतिक क्षेत्र में प्राचीनकाल से ही साहित्य, शिक्षा और कला केन्द्र रहा है। यहाँ की महिष्मति, उज्जैयिनी और धार नगरी ने भारतीय इतिहास का वह स्वर्ण युग देखा है जब यहाँ के प्रतिनिधि कवियों ने अपने काव्य से विश्व साहित्य को समृद्ध किया।
  • किंग एडवर्ड हॉस्पिटल मेडिकल स्कूल, जो 1878 से चला आ रहा था, को जुलाई 1948 में महात्मा गाँधी स्मारक चिकित्सा महाविद्यालय, इंदौर के रूप में परिवर्तित कर दिया गया। इसका शिलान्यास जून 1948 में भारत सरकार की तत्कालीन स्वास्थ मंत्री राजकुमारी अमृत कौर द्वारा किया गया था।
  • 1951 में स्थापित पी.एम.बी. गुजराती कॉलेज इंदौर, 1954 में स्थापित गोविन्दराम सेक्सरिया प्रौद्योगिकी संस्था इंदौर तथा 1955 में स्थापित पशु चिकित्सा विज्ञान तथा पशुपालन एवं पशुधन गवेषणा संस्था, महू, मध्यभारत में स्थापित उच्च क्षिक्षा के क्षेत्र की अन्य प्रमुख संस्थाएँ थीं।
  • मध्य भारत में स्थित बाघ गुफाओं के भित्ति चित्रों ने भारतीय चित्रकला को गौरवान्वित किया। मध्य भारत के चित्रकारों ने उस परंपरा को अक्षुण्ण बनाए रखने का प्रयत्न किया है। श्री पावलकर, श्री पी.नियोगी, देवलालीकर, मनोहर सिंह जोशी, उमेश कुमार श्रीवास्तव, भांड, देवकृष्ण जोशी, रूद्रहान और चन्द्रेश सक्सेना आदि का चित्रकला के क्षेत्र में प्रमुख स्थान रहा।
  • संगीत के क्षेत्र में मध्य भारत निःसंदेह अद्वितीय रहा। उदयन, देवसेना, रूपमति और मानसेन की स्वरलहरी तथा अकबर के नवरत्नों में एक तानसेन की ध्रुपद शैली विख्यात है। बाबा दीक्षित, वासुदेव बुआ जोशी, शंकर राव पंडित आदि अपने शास्त्रीय संगीत के कारण प्रसिद्ध थे। ग्वालियर के संगीतकारों में कृष्णराव पंडित, राजा भैया पूँछवाले, सप्तर्षिबंधु का नाम उल्लेखनीय है। आधुनिक संगीतज्ञों में इंदौर के रहीमुद्दीन का नाम मुख्य है। सरोदवादन के उस्ताद हाफिज अली खाँ भी संगीतज्ञों में उच्च स्थान पर रहे हैं। बीनकार बन्दे अली खाँ उनके शिष्य मुराद खाँ और मुराद खाँ के शिष्य बाबू खाँ बीनकारी के उस्ताद थे (इंदौर)।
  • नाना साहेब आप्टे ख्याति प्राप्त ध्रुपद गायक थे। डारगबंधु, नासिरूद्दीन खाँ डागर तथा रहीमुद्दीन डागर शास्त्रीय संगीत की इस मधुर तथा दुर्लभ शैली के महान गायक माने जाते हैं। मराठी के प्रसिद्ध अभिनेता
  • संगीतज्ञ मास्टर दीनानाथ इंदौर के निवासी थे। उनकी पुत्रियां लता मंगेशकर और आशा भाँसले श्रेष्ठ पार्श्व गायिका हैं।

विंध्य प्रदेश

विंध्य प्रदेश प्रमुख राजकीय सत्ताओं से मिलकर बना था। ये थीः
1. बघेल राजसत्ता,
2. बुंदेलखण्ड राजसत्ता,

  • बघेलखण्ड के इतिहास का प्रारंभ वि.सं. 1234 से शुरू होता है, जब गुजरात के सोलंकी राजा व्याघ्रदेव ने रीवा आकर बघेल राज्य की नींव डाली। बघेलखण्ड भू-भाग में रीवा, सोहावल, कोटी, नागौदा और मैहर राज्य शामिल थे। काशी के गहरवारों से संबद्ध राजा वीरभद्र ने वि.सं. 1928 में पिता हेमकरन की मृत्यु के बाद अटेर नामक स्थान पर बंुदेल राजवंश की नीव डाली। इसी वंश के सोहनपाल के वंशज मलखान सिंह ने परिहारों की प्राचीन राजधानी ओरछा को छीनकर वि.सं. 1558 में ओरछा में अपनी राजधानी बनाई। जिस समय बुंदेलखण्ड पर अंग्रेजों का आधिपत्य स्थापित हुआ, उस समय बंुदेलखण्ड में छोटी-बड़ी कुल 43 रियासतें और जागीरें थी। इसमें ओरछा, दतिया, पन्ना, खनियाधाना, गरौली, अठभैया जागीर (ढुरवई, विजना, बंका-पहाड़ी, टोरी, फतेपुर), बीहट, चरखारी, अजयगढ़, जसो, बिजावर, सरीला, जिगनी, लुगासी, सम्भर, छतरपुर, अलीपुरा, नौगाँव-रिबई, बेरी, बरौछा, गौरिहार, बामनी, चौबे जागीरों (पालदेव,पहरा, तरौन, भैसौधा, कामता, रजौला) मुख्य थीं। 1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद बुंदेलखण्ड और बघेलखण्ड की 35 रियासतों ने संयुक्त राज्य विंध्य प्रदेश निर्माण के संकल्प पत्र पर मार्च 1948 में हस्ताक्षर किए। सर्वप्रथम इस राज्य को रीवा तथा बुंदेलखण्ड दो इकाइयों के रूप में रखा गया, जिसके राजप्रमुख रीवा के महाराज मार्तण्ड सिंह जी देव नियुक्त हुए। कप्तान अवधेश प्रताप सिंह एवं श्री कामता प्रसाद सक्सेना के नेतृत्व में बघेलखण्ड (रीवा) एंव बंुदेलखण्ड में मंत्रिमण्डल बने। जुलाई 1948 में दोनों सरकारों को संयुक्त कर एक मंत्रिमण्डल की स्थापना की गई। इसके प्रधानमंत्री कप्तान अवधेश प्रताप सिंह बने। अंततः 1 जनवरी, 1950 में विंध्य प्रदेश प्रशासित भाग सी स्टेट बन गया। 25 जनवरी, 1950 को विंध्य प्रदेश की द्वीपवत् इकाइयाँ (दतिया जिले को छोड़कर) उत्तर प्रदेश मध्य भारत और मध्य प्रदेश को हस्तांतरित कर दी गई। 1952 में विंध्य प्रदेश में 60 में प्रतिनिधियों की निर्वाचित सभा बनी तथा 2 अप्रैल, 1952 को लोकप्रिय मंत्रिमण्डल स्थापित हुआ, जिसके मुख्यमंत्री पं. शंभुनाथ शुक्ल हुए।
  • विंध्यगिरि की पहाडि़यों में स्थित होने के कारण इस प्रदेश का नाम विंध्य प्रदेश पड़ा। सोन, टोन्स, केन, धसान, बेतवा तथा सिन्धु प्रदेश की प्रमुख नदियाँ थीं, जिनका बहाव दक्षिण से उत्तर की ओर था। प्रपातों की अधिकता के कारण विंध्य प्रदेश को लोग प्रपातों का प्रदेश भी कहते थे। नर्मदा से कपिल धारा, तमस नदी सहायक बीहड़ का चचाई, मुहाना का क्योंटी, ओड्डा का बहुती, केन का पांडव प्रपात और स्नेह केन की सहायता किलकिला का कौआ सेहाऔर समुआ का छोटे पांडव ‘, जामुने की सहायताजमड़ार का कुंडेश्वरतथा सिंध्य का सनकुआमुख्य प्रपात थे।
  • विंध्य प्रदेश की राजधानी रीवा थी तथा नौगाँव में भी कई मुख्य कार्यालय थे।


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