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मध्य प्रदेश इतिहास के आईने में, 1857 का स्वतंत्रता संग्राम व मध्य प्रदेश

  • पृथ्वी के भू-वैज्ञानिक इतिहास के प्रारंभिक काल से ही दक्कन का पठार स्थल का भाग रहा है। मध्य प्रदेश में निम्नलिखित प्राचीनतम शैल यत्र-तत्र प्राप्त होते हैः
  • 1. आद्य महाकल्प चट्टान- विंध्यन व दक्कन ट्रैप का आधार आद्य महाकल्प शैल है। बुंदेलखण्ड की गुलाबी ग्रेनाइट चट्टान, नीस, सिल तथा डाइक भी इसी शैल से निर्मित हैं।
  • 2. धारवाड़ शैल समूह- बालाघाट की चिलपी श्रेणी व छिंदवाड़ा की सौंसर श्रेणी। बुंदेलखण्ड व विंध्यन के मध्य बिजावर श्रेणी। इसमें जीवाश्म नहीं मिलते हैं।
  • 3. पुराना शैल समूह-बिजावर श्रृंखला (पन्ना, ग्वालियर)।
  • 4. विंध्यन और समूह- रीवा से चंबल तक विस्तारित (सोन घाटी, कैमूर, भाण्डेर तथा रीवा श्रेणी)।
  • 5. गोण्डवाना शैल समूह- सतपुड़ा व बघेलखण्ड में विस्तारित है। पेंच घाटी, मोहपानी, पंचमढ़ी, देनवा, बागरा आदि कोयला क्षेत्र।
  • 6.दकन ट्रैप- बाघ तथा लमेटा स्तरों के निक्षेपण से ज्वालामुखी क्रिया पश्चात् बेसाल्ट निर्मित मालवा का पठार।
  • 7.तृतीयक शैल समूह- गोण्डवाना महाद्वीप के टूटने पश्चात् दकन के पठार को वर्तमान रूप मिला इसी समय टेथिस सागर का निक्षेपण होने से मोड़दार पर्वत हिमालय बना।

स्पष्टतः प्रदेश में प्राचीनतम से नवीनतम चट्ठानों का प्रतिनिधित्व मिलता है, जो इसकी ऐतिहासिकता का स्वयंमेव साक्ष्य उपलब्ध कराता है। यहॉ हुए उत्खनन व पुरा शोध उपरांत उपकरणों की बनावट के आधार पर प्रागैतिहासिक काल को निम्नानुसार बॉटा जा सकता हैः
1. पुरापाषाण काल (2.5 लाख से 10,000 ईसा पूर्व)

अ. नर्मदा घाटी सर्वेक्षण-
  • एच.डी. सांकलिया, मैक क्राऊन, आर.बी.जोशी
  • होशंगाबाद, नरसिंहपुर में पुरातन जीवाश्म प्राप्त।
  • हथनोरा से नर्मदेनसिस मानव की खोपड़ी (होशंगाबाद जिला)।
  • डी. टेरा व पीटरसन को कुल्हाड़ी व बुगंदा प्राप्त।
  • पी. खत्री ने कुल्हाड़ी, औजार संग्रहित किए।
  • महादेव पिपरिया में सुपेकर को 860 औजार मिले।
  • चम्बल घाटी में वाकणकर को मंदसौर से औजार प्राप्त।
  • बेतवा घाटी व भीमबैटका से औजार प्राप्त।
  • निसार अहमद ने सोन घाटी से उपकरण खोज निकाले।
  • बी.बी.लाल ने ग्वालियर व जी. शर्मा ने रीवा, सतना क्षेत्रों में उत्खनन कार्य किया।
  • ब. मध्य पूर्व पाषाण काल
  • मण्डला में सर्वेक्षण कार्य सूपेकर द्वारा।
  • सोन घाटी से 464 औजार मिले।
  • मंदसौर, नाहरगढ़, इंदौर, सीहोर, भीमबेटका से प्रमाण मिले।
  • स. उच्च पूर्व पाषाण काल
  • भीमबेटका, रीवा, सोन घाटी क्षेत्र, शाहडोल क्षेत्र से उपकरण प्राप्त हुये।

2.मध्य-पाषाण काल
  • बी.बी. मिश्रा ने भीमबेटका से ब्लेड अवयव खोजे।

3. नव-पाषाण काल
  • ऐरण, जतकारा दमोह, सागर, आदमगढ़ (होशंगाबाद), जबलपुर आदि क्षेत्रों में नव-पाषाणकालीन संस्कृति के साक्ष्य मिले हैं।

4. ताम्रपाषाण कालीन स्थल
  • हड़प्पा संस्कृति के चिन्ह मध्य प्रदेश में नहीं मिलें हैं।
  • महेश्वर नवदाटोली (1440 ई.पू.), कायथा-ऐरण (2000ई.पू.) से पत्थर, ब्लेड उपकरण व ताम्र धातु का एक साथ प्रयोग के साक्ष्य मिले हैं।

5. लौह युग संस्कृति (1000ई.पू.)
  • भिण्ड, मुरैना, ग्वालियर क्षेत्र में लौहयुगीन संस्कृति के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।

6. महापाषाण संस्कृति (मेगालिथ)
  • रीवा-सीधी क्षेत्र में महापाषाण स्मारक के साक्ष्य हैं।

स्पष्ट है कि, मध्य प्रदेश का इतिहास अत्यंत समृद्ध रहा है, जिसका समृद्ध व विस्तृत विवेचन निम्नानुसार हैः
प्रागैतिहासिक काल-मध्य प्रदेश
राज्य के विभिन्न भागों से की गई पुरातात्विक खुदाई व खोज से प्रागैतिहासिक काल के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।
डॉ. एच.डी. सांकलिया, सुपेकर, आर.बी. जोशी और बी.बी लाल आदि पुरातत्वविदों ने नर्मदा घाटी का सर्वेक्षण किया। नरसिंहपुर के निकट पुरातत्वविदों द्वारा एक खोपड़ी जीवाश्म की खोज की गई। होशंगाबाद, मण्डला, नरसिंहपुर क्षेत्र से इस काल के औजार प्राप्त किए गए हैं। बी.बी. लाल द्वारा ग्वालियर क्षेत्र से पूर्व पाषाणकालीन औजारों की खोज की गई। निसार अहमद द्वारा सोन घाटी के उत्खनन में पूर्व पाषाणकालीन अवशेष 35 स्थानों से प्राप्त हुए थे, जबकि जी.आर. शर्मा ने सतना व रीवा क्षेत्र में उत्खनन के दौरान 100 से अधिक पाषाणकालीन स्थलों की खोज की थी।
नरसिंहपुर व भीमबेटका की गुफाओं के उत्खनन से पूर्व पाषाण काल के साक्ष्य प्राप्त हैं, जिनमें नरसिंहपुर से प्राप्त आद्य सोहन किस्म के गॅडासे और खंडक उपकरण तथा चौतरा किस्म के हस्तकुठार और विदारणियॉ भी शामिल हैं, जबकि भीमबेटका की गुफाओं से सुस्पष्ट निवास स्थलों की एक श्रेणी प्राप्त हुई है। साथ ही साथ भीमबेटका से एश्यूलियन् उपकरण की प्राप्ति से वृहत् आबादी का संकेत मिला है जो विदारणियों के निर्माण में अत्यन्त कुशल व अनुभवी थे।
भीमबेटका गुफाओं तथा सोन घाटी के क्षेत्र से मध्य पूर्व पाषाण काल के उपकरण प्राप्त हुए हैं। इस राज्य में ईसा पूर्व 30 हजार से 10 हजार के मध्य तक मानव जीवन पूर्णतया प्राकृतिक था।
मध्य पाषाण काल (1000 ई.पू.)
भारत में मध्य पाषाणकाल के बारे में जानकारी सर्वप्रथम 18670 में हुई जब सी.एल. कालाईल ने विंध्य क्षेत्र में लघु पाषाणोपकरण की खोज की। 19640 में आर.बी. जोशी ने होशंगाबाद जिले में स्थित आदमगढ़ शैलाश्रय में लगभग 25 हजार लघु पाषाणोपरकरण प्राप्त किये। भीमबेटका शिलाश्रयों तथा गुफाओं से मध्य पाषाणकाल के उपकरण प्राप्त हुए हैं।
नव-पाषाणकालीन संस्कृति (5000ई.पू.)
शवाधान की प्रक्रिया अग्नि के उपयोग का ज्ञान तथा कृषि व पशुपालन से परिचित हो चुके थे। इस काल में पत्थरों के अतिरिक्त हड्डियों के औजार भी बनाये जाने लगे थे। भारत में इस संस्कृति के बस्तियों का सबसे पहला प्रमाण मेहरगढ़ से प्राप्त होता है, जो पाकिस्तान के बलूचिस्तान का एक भूभाग है। इस काल के औजार ऐरण, जतकारा, जबलपुर, दमोह, सागर, व होशंगाबाद आदि क्षेत्रों से प्राप्त हुए हैं।
ताम्र पाषाणकालीन संस्कृति
ताम्र पाषाण अवस्था की बस्तियों के प्रमाण (पत्थर, ब्लेड व ताँबे का प्रयोग) इस राज्य के पश्चिमी भूभाग से मिले हैं। राज्य के पुरात्वविदो द्वारा पश्चिमी म0प्र0 के मालवा, कायथा, नवदाटोली, और ऐरण में खुदाई की, जिसमें कायथा में चॉक की सहायता से बनाये गये मिट्ठी के बर्तन, ताँवे, की चूडि़याँ व कुल्हाडि़याँ, पत्थर के सूक्ष्म हथियार व मनके प्राप्त हुए हैं, नवदाटोली में सुनियोजित बस्ती, लाल-काले रंग के मृदभांड, तांबे के उपकरण तथा गेंहँू, मटर, चना व चावल की कृषि के प्रमाण मिलते है, मालवा में वृषभ मूर्तियों के प्रमाण मिले है, जिससे यह स्पष्ट है कि वृषभ इस काल में धार्मिक सम्प्रदाय का प्रतीक था जबकि ऐरण में राज्य के ताम्रकालीन संस्कृति के विकास की स्थिति देखने को मिलती हैं। इनमें मालवा व नवदाटोली के उत्खनन से 1440 ई. पूर्व तक के साक्ष्य तथा कायथा व ऐरण के उत्खनन से 2000 ई. पूर्व तक के साक्ष्य हुए हैं।
सैंधवकालीन संस्कृति (2300 ई.पू.)
  • राज्य में सैधव कालीन संस्कृति के चिन्ह नहीं मिले हैं।

वैदिक काल (1500-600 ई.पू.)
  • आर्यों का भारत में सर्वप्रथम आगमान ‘पंचनद प्रदेश में हुआ था, लेकिन उन्हें नर्मदा घाटी और उसके प्रदेश की जानकारी थी। महर्षि अगस्त्य के नेतृत्व में यादवों का एक झुण्ड इस क्षेत्र में बस गया और यहीं से इस क्षेत्र में आर्यों का आगमान आरम्भ हुआ।
  • पौराणिक जनश्रुतियों के अनुसार कारकोट के नागवंशी शासक नर्मदा के किनारे काठे के शासक थे। ऐसे समय गन्धवों से जब उनका झगड़ा हुआ तो अयोध्या के इक्ष्वाकु नरेश मांधाता ने अपने पुत्र पुरूकुत्स को नागों की सहायता के लिए भेजा । पुरूकुत्स की सेना ने गन्धार्वों को बुरी तरह हराया। इस विजय अभियान से खुश होकर नाग शासक ने अपनी कन्या ‘रेवा का विवाह इक्ष्वाकु राजकुमार पुरूकुत्स से कर दिया। पुरूकुत्स ने रेवा का नाम नर्मदा में परिवर्तित कर दिया। इसी वंश के शासक मुचुकुन्द ने ऋक्ष और परियात्र पर्वतमालाओं के बीच नर्मदा के किनारे अपने पूर्वज नरेश मांधाता के नाम पर मांधाता नगरी की स्थापना की थी (वर्तमान खाण्डवा जिला)।
  • यदु कबीले के हैहय शाखा के शासकों के काल में इस क्षेत्र की अभिवृद्धि  चरम पर थी। हैहय राजा महिष्मत ने नर्मदा के किनारे  ‘महिष्मति नगर को बसाया। उन्होंने इक्ष्वाकु व नागों को भी हराया। कीर्तवीर्य अर्जुन इस वंश का प्रतापी राजा था।

महाकाव्य काल
  • रामायण काल में प्राचीन म.प्र. के अंतर्गत दण्डकारण्य व महाकान्तार के घने वन थे। यदुवंशी नरेश मधु इस क्षेत्र के शासक थे जो अयोध्या के राजा दशरथ के समकालीन थे। राम ने अपने वनवास का कुछ समय दण्डकारण्य (अब छत्तीसगढ़) में बिताया था। शुत्रध्न के पुत्र शुत्रघाती ने दशार्ण (वर्तमान विदिशा) पर शासन किया था, जिनकी राजधानी कुशावती थी, जबकि पुराणों में वर्णन है कि विंध्य प्रदेश व सतपुड़ा के वनों में कभी निषाद जाति के लोग निवास करते थे, जिनका आर्यों से अच्छा संबंध था।
  • महाभारत के युद्ध में इस क्षेत्र के राजाओं का भी अच्छा योगदान रहा। इस युद्ध मे वत्स, काशी, चेदि, दशार्ण व मत्स्य जनपदों के राजाओं ने पाण्डवों का साथ दिया, वहीं महिष्मति के नील, अवन्ति के बिन्द, भोज, अंधक, विदर्भ व निषाद के राजाओं ने कौरवों की तरफ से लड़ा। पाण्डवों ने अपने अज्ञातवास का कुछ समय यहॉ के वनों में भी व्यतीत किया था। कुन्तलपुर (कौंडि़या), विराटपुरी (सोहागपुर), महिष्मती (महेश्वर) व उच्चयिनी (उच्चैन) महाकाव्य काल के प्रमुख नगर थे।

प्राचीन जनपद-नवीन नाम
  • अवन्ती-उज्जैन
  • वत्स-ग्वालियर
  • चेदि-खजुराहो
  • अनूप-निमाड़ (खण्डवा)
  • दशार्ण -विदिशा
  • तुंडीकोर-दमोह
  • नलपुर-नरवर(शिवपुरी)

महाजनपद काल
  • 600 ईसा पूर्व के 16 महाजनपदों में इस राज्य के चेदि व अवन्ती जनपद थे। अवन्ती महाजनपद अत्यन्त विशाल था। यह पश्चिमी और मध्य मालवा के क्षेत्र में बसा हुआ था जिनके दो भाग थे। उत्तरी अवन्ती जिसकी राजधानी उच्चयिनी थी तथा दक्षिणी अवन्ती जिसकी राजधानी महिष्मती थीं। इन दोनों क्षेत्रों के बीच वैत्रवती नदी (वर्तमान बेतवा नदी) बहती थी। विष्णु पुराण से यह पता चलता है कि पुलिक बार्हद्रथ वंश के अंतिम राजा रिपुंजय का अमात्य था, जिसने अपने स्वामी को हटाकर अपने पुत्र प्रद्योत को वहाँ का राजा बनाया। प्रद्योत के बाद उसका पुत्र पालक अवन्ती का राजा हुआ। परिशिष्टपर्वत् से पता चलता है कि, पालक ने वत्स राज्य पर आक्रमण कर उसकी राजधानी कौशाम्बी पर अधिकार कर लिया था, उसके बाद विशाखयूप, अजक व नन्दिवर्मन ने बारी-बारी से राज्य किया।
  • कालान्तर में मगध के हर्यक कुल के अंतिम शासक नागदशक (दर्शक) के काल में उनके अमात्य शिशुनाग द्वारा अवन्ति राज्य पर आक्रमण कर वहाँ के प्रद्योत वंश के अंतिम शासक नन्दिवर्धन को पराजित किया गया और अवन्ति राज्य के पूरे क्षेत्र को मगध में मिला लिया गया। इस प्रकार मगध में शिशुनाग वंश का अभ्युदय हुआ। नन्द वंश का पहला शासक महापद्मनंद शिशुनाग वंश के बाद बना। इसने ही राज्य में नन्द वंश की स्थापना की।
  • पुरात्वविदों द्वारा बड़वानी से की गई खुदाई में मिली नंदों की मुद्राएँ इस तथ्य को स्पष्ट रूप से उजागर करती है कि यहाँ इनका शासन अवश्य था।

मौर्यकाल (323-187 ई.पू.)
  • चन्द्रगुप्त मौर्य के पुत्र बिन्दुसार के समय अवन्ती प्रदेश का कुमारामात्य अशोक था जो अपने पिता की मृत्यु के पश्चात् मगध का शासक बना, जिसने  देवानाम् पिय की उपाधि धारण की थी। सिंहली परम्पराओं से पता चलता है कि उच्चयिनी जाते हुए अशोक विदिशा में रूका, जहाँ उसने एक श्रेष्ठी की पुत्री देवी के साथ विवाह कर लिया। महाबोधिवंश में उसका नाम वेदिशमहादेवी मिलता है तथा उसे शाक्य जाति का बताया गया है। उसी से अशोक के पुत्र महेन्द्र तथा पुत्री संघमित्रा का जन्म हुआ था। मौर्ययुगीन सम्राट अशोक के द्वारा निर्मित लघु शिलालेखों में निम्न का संबंध वर्तमान म.प्र. राज्य से  था (1) रूपनाथ जबलपुर जिले के सिहोरा तहसील का एक गाँव, (2) गुर्जरा (दतिया), (3) सारो मारो (शहडोल) व (4) पानगुड़ारिया (सीहोर )( 5) साँची (रायसेन)। लघु शिलालेख व लघु स्तंभ लेख इस बात के प्रमाण है कि इस राज्य (म.प्र) मौर्ययुगीन शासन व्यवस्था अवश्य कायम थी।

शुंग वंश (148-72 ई.पू.)
  • पुष्यमित्र ने 184 ईसा पूर्व में अंतिम मौर्य सम्राट बृहद्रथ की हत्या कर शुग वंश की स्थापना की थी। मालविकाग्निमित्रम्, जो महाकवि कालीदास द्वारा रचित एक नाट्य ग्रन्थ है, से पता चलता है कि पुष्यमित्र शुंग का पुत्र अग्निमित्र विदिशा का राज्यपाल था तथा उसने विदर्भ राज्य के राज्यपाल का कार्यभार अपने मित्र माध्वसेन को सौंपा।
  • सांची (रायसेन) व भरहुत (सतना) से प्राप्त कलाकृतियों के आधार पर यह स्पष्ट हो जाता है कि, पुष्यमित्र शुंग को बौद्ध धर्म का संहारक कहना उचित नहीं होगा क्योंकि इस काल में इन स्थलों के स्तूप न केवल सुरक्षित ही रहे बल्कि इन्हें राजकीय व व्यक्तिगत सहायता भी मिलती रही इस वंश का नवाँ शासक भागभद्र था। इसके शासन काल के 14वें वर्ष में तक्षशिला के यवन नरेश ऐण्टियालकीड्स का राजदूत हेलियोडोरस उसके विदिशा स्थित दरबार में उपस्थित हुआ। उसने भागवत धर्म ग्रहण कर लिया तथा विदिशा के पास बेसनगर (भिलसा) में गरूड़-स्तंभ की स्थापना की थी।

मध्य प्रदेशः शंुग कालीन कलाकृतियाँ
  • भरहुत- सतना जिले में एक विशाल स्तूप का निर्माण हुआ था। इसके अवशेष आज अपने मूल स्थान पर नहीं हैं, परन्तु उसकी वेष्टिनी का एक भाग तथा तोरण भारतीय संग्रहालय कोलकाता तथा प्रयाग संग्रहालय में सुरक्षित है। 18750 में कनिंघम द्वारा जिस समय इसकी खोज की गई उस समय तक इसका केवल 10 फुट लम्बा और 6 फुट चौड़ा भाग ही शेष रह गया था।
  • साँची (काकनादबोट)ः 18180 में सर्वप्रथम जनरल टेलराने यहाँ के स्मारकों की खोज की थी। 1818 ई. में मेजर कोल ने स्तूप संख्या 1 को भरवाने के साथ उसके द.प. तोरण द्वारों तथा स्तूप के तीन गिरे हुए तोरणों को पुनः खड़ा करवाया। यहाँ पर इस काल में तीन स्तूपों का निर्माण हुआ है जिसमें एक विशाल तथा दो लघु स्तूप हैं। महास्तूप में भागवान बुद्ध के, द्वितीय में अशोककालीन धर्म प्रचारकों के तथा तृतीय में बुद्ध के दो प्रमुख शिष्यों सारिपुत्र तथा महामोदग्लायन के दन्त अवशेष सुरक्षित हैं। इस महास्तूप का निर्माण मौर्य सम्राट अशोक के समय में ईंटों की सहायता से किया गया था। उनके चारों ओर काष्ठ की वेदिका बनी थी। अशोक का संघभेद रोकने की आज्ञा वाला अभिलेख यहीं से मिला हैं।

कुषाण काल (प्रथम शताब्दी ई.पू.)
  • साँची व भेड़ाघाट से कनिष्क संवत् 28 का एक लेख मिला है। यह वासिष्क का है, तथा बौद्ध प्रतिमा पर खुदा हुआ है।
  • कनिष्क के राज दरबार में निम्न विद्वानों की उपस्थिति थी-1. अश्वघोष (राजकवि) (रचनाएं-बुद्धचरित्र, सौन्दर्यानन्द व सारिपुत्र प्रकरण),2. आचार्य नागार्जुन, 3. पार्श्व,4. वसुमित्र, 5. मातृचेट, 6. संघरक्ष, 7. चरक (चरक संहिताग्रन्थ)।
  • कुषाणों का स्थान भारशिव नाग वंश ने लिया, जिनकी राजधानी पद्मावती थी।

मालव
  • सिंकन्दर के आक्रमण (326 ई.पू.) के समय मालव गणराज्य के लोग पंजाब में निवास कर रहे थे। कालान्तर में ये पूर्वी राजपूताना आकर बस गये। पाणिनि ने उनका उल्लेख आयुधजीवी संघ के रूप में किया है। राज्य से प्राप्त सिक्कों के आधार पर इसका काल ईसा की दूसरी से तीसरी शताब्दी के मध्य निर्धिरित किया है। सिक्कों से प्राप्त लेख के आधार पर यह स्पष्ट किया जा सकता है कि यहाँ गणतंत्र शासन पद्धति कायम थी।

गुप्त काल (280-550 ईस्वी) राजधनी पाटलिपुत्र
  • संस्थापक श्री गुप्त के बाद उनका पुत्र घटोत्कच इस वंश का राजा हुआ। चन्द्रगुप्त प्रथम ‘महाराजधिराज की उपाधि धारण की। गुप्त संवत् का प्रवर्तन इन्होंने ही 319-20 में किया था। प्रयाग प्रशस्ति के अतिरिक्त म.प्र. के सागर जिले में स्थित ऐरण नामक स्थान से भी समुद्रगुप्त का लेख प्राप्त हुआ है, जो खण्डित अवस्था में हैं। इसमें समुद्रगुप्त को पृथु, राघव आदि राजाओं से भी बढकर दानी कहा गया हैं इस लेख से यह भी पता चलता है कि ऐरिकिण प्रदेश (ऐरण) उसका भोगनगर था। हरिरूषेण द्वारा रचित प्रयाग प्रक्रिया के तेरहवीं व चौदहवीं पंक्तियो यह स्पष्ट जानकारी मिलती है कि समुद्रगुप्त अपनी दिग्विजय प्रक्रिया के प्रारंभ में सर्वप्रथम उत्तर भारत के तीन शक्तिशाली राजाओं यथा-अच्युत, नागसेन व कोतकुलज के साथ आर्यावर्त का प्रथम युद्ध किया और इसमें उसने सभी को पराजित कर दिया। इन पराजित राजाओं में नागसेन (नागवंशी शासक) पवाया (ग्वालियर जिले में स्थित पद्मपवैया) में शासन करता था। गुप्त सम्राट समुद्रगुप्त का समकालीन शक शासक रूद्रसिंह तृतीय (348-378 ई.) था जो पश्चिमी मालवा, गुजरात व काठियावाड़ का शासक था।
  • दुर्जनपुर (विदिशा जिला) के लेख से यह जानकारी मिलती है कि समुद्रगुप्त की मृत्यु के बाद कुछ समय के लिए उसका बड़ा पुत्र रामगुप्त शासक बना। यह जानकारी मालवा क्षेत्र के दो स्थानों एरण व भिलसा से प्राप्त ताम्र मुद्राओं से होती है। भिलसा से ताम्र सिक्के प्रसिद्ध प्रसिद्ध मुद्राशास्त्री परमेश्वरी लाल गुप्त को प्राप्त हुए थे, जबकि एरण से सागर विश्वविद्यालय के अध्यक्ष कृष्णदत्त वाजपेजी को प्राप्त हुए थे, जिनमें ऐरण के सिक्कों पर सिंह व गरूड़ का चित्र था। गरूड़ गुप्त वंश का राजकीय चिन्ह था।
  • चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य ने नागवंश की कन्या कुबेरनाग से विवाह कर नागवंशीय शासकों से मैत्री की। इसी कुबेरनाग से प्रभावती गुप्त नामक कन्या का जन्म हुआ। उसने वाकाटकों से सहयोग लेने के लिए अपने राज्यारोहण  के उपरान्त अपनी पुत्री प्रभावती गुप्त का विवाह वाकाटक नरेश रूद्रसेन द्वितीय से कर दिया। वाकाटक उस समय आधुनिक महाराष्ट्र प्रान्त में शासन करते थे। कुछ समय बाद रूद्रसेन द्वितीय की मृत्यु हो गई और प्रभावती गुप्त वाकाटक राज्य की संरक्षिका बन गयी क्योंकि उसके दोनों पुत्र दिवाकरसेन व दामोदरसेन अवयस्क थें। इसी के शासन काल में चन्द्रगुप्त द्वितीय (विक्रमादित्य) ने शकों को हराकर उनके राज्य गुजरात व कठियावाड़ को अपने साम्राज्य में मिला व शकारि कहलाया।
  • चन्द्रगुप्त द्वितीय के तीन अभिलेख पूर्वी मालवा से प्राप्त हुए हैं, जिसने शक विजय की सूचना मिलती है। इनमें प्रथम अभिलेख भिलसा के समीप उदयगिरि पहाड़ी से मिला है जो उसके संधि विग्राहक वीरसेन साव का है। दूसरा अभिलेख भी उदयगिरि से मिला है, जो कि उसके सामन्त सनकानीक महाराजा का है, जबकि तीसरे में पदाधिकारी का उल्लेख है जो सैकड़ों युद्धों का विजेता था इसके शासन काल में इस प्रदेश का भूभाग उज्जयिनी  विद्या का प्रमुख केन्द्र था। यहाँ चन्द्र्रगुप्त से तात्पर्य चन्द्रगुप्त द्वितीय (विक्रमादित्य) से था। अनुश्रुति के अनुसार उसके दरबार में नव विद्वानों की एक मंडली निवास करती थीं, जिसे, ‘नवरत्न नाम दिया गया है। इसका नेतृत्व कालिदास कर रहे थे। इसी के शासन काल में उज्जयिनी को मगध की दूसरी राजधानी के रूप में विशेष रूप से विकसित किया गया था, जिसने शीघ्र ही वैभव तथा समृद्धि में पाटलिपुत्र का स्थान ले लिया। मृच्छकटिकम् से ज्ञात है कि यहाँ अनेक धनाढ्य श्रेष्ठि व सौदागर निवास करते थे। इस काल में उज्जैन व विदिशा का प्रमुख व्यापारिक नगरों में  स्थान था।

प्रमुख अभिलेख
  • मन्दसौर अभिलेखः यह भू-भाग प्राचीन पश्चिमी मालवा का हिस्सा था जिसका नाम दशपुर भी मिलता है। इसमें विक्रम संवत् 529 (473ई.) की तिथि दी गई है। यह लेख प्रशस्ति के रूप में है, जिसकी रचना संस्कृत विद्वान वत्सभट्ठि ने की थी। इस लेख में इस राजा के राज्यपाल बन्धुवर्मा का उल्लेख मिलता है जो वहाँ शासन करता था। इस लेख में सूर्य मंदिर के निर्माण का भी उल्लेख किया गया है।
  • साँची अभिलेख- यहाँ से प्राप्त लेख गुप्त संवत् 131-4500 का है। इसमें हरिस्वामिनी द्वारा यहाँ के आर्यसंघ को धन दान में दिये जाने का जिक्र है।
  • उदयगिरि गुहालेख - गुप्त संवत् 106 या 425 ई. का एक जैन अभिलेख मिला है। इसमें शंकर नामक व्यक्ति द्वारा इस स्थान में पार्श्वनाथ की मूर्ति स्थापित किये जाने का विवरण है।
  • तुमैन अभिलेख- यह अभिलेख गुना जिले में है। यहाँ से गुप्त वंश 116 या 435 ई. का लेख मिलता है। इसमें राजा को शरद कालीन सूर्य की भाँति बताया गया है। कुमार गुप्त का शासन काल केे समय पुष्यमित्र जाति के लोगों को शासन नर्मदा नदी के मुहाने के समीप मैकल में था। इस राज्य (म.प्र.) के एरण प्रदेश (पूर्वी मालवा) पर भी कुमारगुप्त प्रथम का शासन स्थापित था क्योंकि अभिलेखों से प्राप्त प्रान्तीय पदाधिकारियों की सूची में इस एरण प्रदेश के शासक घटोत्कच गुप्त का नाम भी ज्ञात होता है। कुमारगुप्त प्रथम की मृत्यु के बाद गुप्त साम्राज्य की बागडोर उसके पुत्र स्कन्दगुप्त के हाथों में आ गई।
  • सुपिया का लेख- रीवा जिलें में स्थित सुपिया नामक स्थान का यह लेख मिला है, जिसमें गुप्त संवत् 141-460 ई. की तिथि लिखी है। इसमें गुप्तों की वंशावली घटोत्कच के समय से मिलती है तथा गुप्त वंश को घटोत्कच कहा गया है।
  • ऐरण- तोरमाण का वराह प्रतिमा एरण अभिलेख व मिहिरकुल का ग्वालियर अभिलेख हूणों की उपस्थिति दर्शाता है।

भारत में हूणों का द्वितीय बार आक्रमण नरसिंहगुप्त बालादित्य (बुद्धगुप्त का छोटा भाई) के शासन काल में हुआ, जिसमें हूण नरेश मिहिरकुल को पराजित होना पड़ा तथा गुप्त नरेश द्वारा बन्दी बनाकर माँ के कहने पर मुक्त कर दिया गया।
मालवा के परमार वंश का काल
संस्थापक-सीयक
राजधानी-उज्जैन व धार
  • परमार वंशीय शासक राष्ट्रकूट राजाओं के सामंत थे। सर्वप्रथम इस वंश का शासक हर्ष अथवा सीयक द्वितीय ने 945 ई. में अपने को स्वतंत्र घोषित किया और नर्मदा के तट पर तत्कालीन राष्ट्रकूट शासक खोट्ठिंग को परास्त किया। इसकी मृत्यु के बाद वाक्पति मु´ज शासक बना। हूणमडल (मालवा के उत्तर-पश्चिमी में स्थित) के हूणों ने उसकी अधीनता स्वीकार की। वाकपति मुंज ने (972-994) गोदावरी नदी पार कर चालुक्य नरेश तैल द्वितीय पर आक्रमण किया जिसमें वह हार गया तथा बंदी बनाकर तैल द्वितीय द्वारा मार दिया गया। मंुज ने धार में मंुजसागर झील बनवाई। मंुज की मृत्यु के बाद इस वंश का शासक उसका छोटा भाई सिन्धुराज बना, जिसने सर्वप्रथम अपने समकालीन चालुक्य शासक सत्याश्रय को हराकर उन प्रदेशों पर अधिकार कर लिया जिसे उसके भाई मंुज ने तैल द्वितीय से जीता था। सिन्धुराज की मृत्य     ु के पश्चात् उसका पुत्र भोज गद्दी पर बैठा। अपने शासन के अंतिम दिनों मे वह अपने साम्राज्य की सुरक्षा नहीं कर सका। चालुक्य नरेश सोमेश्वर द्वितीय ने उसकी राजधानी धारा नगरी पर आक्रमण किया, जिसमें भोज की हार हुई। यह जानकारी नागाई लेख (1058 ई.) से प्रप्ता होती है। भोज की मृत्यु के बाद कलचुरि नरेश लक्ष्मीकर्ण व चालुक्य नरेश भीम ने उसकी राजधानी धारा पर बारी-बारी से आक्रमण किया।
  • भोजकाल (1000 ई.) में यह नगर विद्या व कला का महत्वपूर्ण केन्द्र बन गया । यहाँ अनेक महल व मंदिर बनवाये गए, जिसमें सरस्वती मंदिर सर्वप्रमुख था। उसने धार के सरस्वती मंदिर में प्रसिद्ध संस्कृत विद्यालय की स्थापना करवाई (वाग्देवी की प्रतिमा भी)।
  • परमार शासक भोज ने भोपाल के द.पू. में 250 वर्ग मील लंबी एक झील का निर्माण करवाया जो आज भी भोजसर नाम से प्रसिद्ध है।
  • गंजबासौदा (विदिशा) के समीप उदयपुर नामक स्थान के नीलकण्ठेश्वर मंदिर के एक शिलापट्ठ के उपर उत्कीर्ण प्रशस्ति ही उदयपुर प्रशस्ति के नाम से प्रसिद्ध है, जिसमें परमार वंश के शासकों के नाम तथा उनकी उपलब्धियों के बारे में स्पष्ट जानकारी दी गई है।
  • भोज लिखित ग्रंथ हैं। आयुर्वेद सर्वस्व, समरांगण सूत्रधार।

चंदेल वंश (जेजाकभुक्ति)

  • राजधानी-खजुराहो। इसकी स्थापना 831ई. में नन्नुक नामक व्यक्ति द्वारा की गई। लेखों में इन्हें चन्द्रात्रेय ऋषि का वंशज कहा गया है, जो आत्रि के पुत्र थे।
  • हर्ष (905-925) के बाद इसका पुत्र यशोवर्मन गद्दी पर बैठा था, जिसने कन्नौज के प्रतिहारों को समाप्त किया और राष्ट्रकूटों के कालिंजर का दुर्ग जीता तथा मालवा के चेदि शासक को अपने अधीन कर लिया। यशोवर्मन (लक्ष्मणवर्मन) ने ही खजुराहो के प्रसिद्ध विष्णु मंदिर का निर्माण करवाया। इस मंदिर में उसने बैकुण्ठ की मूर्ति स्थापित करायी थी, जिसे उसने प्रतिहार शासक देवपाल से प्राप्त किया था।
  • यशोवर्मन के बाद उसका पुत्र धंग राजा बना, जिसने कालिंजर पर अपना अधिकार सुढृढ़ कर उसे अपनी राजधानी बनाया। इसके बाद ग्वालियर पर अपना अधिकार जमाया।
  • धंग (950-1008 ई.) ने खजुराहों में पार्श्वनाथ, विश्वनाथ तथा वैद्यनाथ आदि के मंदिर बनवाए इसके प्रयाग में गंगा-यमुना के पवित्र संगम पर अपना शरीर त्याग दिया। गंड(1008 ई.) ने जगदम्बी व चित्रगुप्त मंदिर बनवाए।
  • विद्याधर(1017-1029)ही एक ऐसा भारतीय शासक था, जिसने महमूद गजवनी की महत्वाकाक्षांओं का सफलतापूर्वक विरोध किया। इसके मालवा परमार के शासक भोज व त्रिपुरि के कलचुरि शासक गांगेयदेव को भी हराकर उसे अपने अधीन में किया। विद्याधर की मृत्यु के बाद उसके पुत्र विजयपाल व पौत्र देववर्मन के काल में चंदेल त्रिपुरि के कलचुरि-चेदि वंशी शासकों यथा गांगेयदेव व कर्ण की अधीनता स्वीकार करते थे परंतु इन दोनों के बाद किर्तिवर्मन इस वंश का शासक बना जिसने चेदि नरेश कर्ण को हराकर पुनः अपने प्रदेश को स्वतंत्र किया। इसकी पुष्टि अजयगढ़ व महोबा से प्राप्त चंदेल लेख से भी हो जाती है। इस वंश का अंतिम शासक परमर्दिदेव (परमाल ) था जिसने 1165-1203 ई. तक शासन किया। यह 1182 ई. में महोबा में पृथ्वीराज चौहान द्वारा तथा 1203 ई. में कालिंजर में कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा पराजित हुआ था। कालिंजर के युद्ध में परमर्दिदेव की मृत्यु हो गई। परमर्दी देव के साहसी दरबारी थे-आल्हा व उदल।
  • कन्दरिया महादेव मंदिर (खजुराहो): इसके गर्भगृह में शिव, गणेश तथा प्रमुख हिन्दू देवियों की मूर्तियाँ बनी हैं। इस मंदिर के भीतरी तथा बाहरी  दीवारों पर अनेक भव्य मूर्तियाँ उत्कीर्ण की गईं हैं।

कलचुरिः चेदि वंश

  • स्थापना-कोक्कल प्रथम( 850 ई.) राजधानी-त्रिपुरी (तेबर ) जबलपुर। इस वंश का प्रथम शासक कोक्कल प्रथम था। युवराज प्रथम राष्ट्रकूट नरेश कृष्ण तृतीय के साथ युद्ध में हार गया तथा इस कारण इस क्षेत्र पर कुछ समय के लिए राष्ट्रकूटों का अधिकार हो गया परंतु शीघ्र ही युवराज प्रथम ने अपनी सेना को लेकर राष्ट्रकूटों पर धावा बोलकर उन्हें परास्त कर अपने साम्राज्य से बाहर कर दिया। 
  • युवराज प्रथम के ही शासन काल में राजशेखर कन्नौज छोड़कर त्रिपुरी आया, जहाँ उन्होंने दो ग्रंथों-काव्यमीमांसा व विद्धशालभंजिका की रचना की। राजशेखर की रचना विद्धशालभंजिका में युवराज को उज्जयिनी भुजंग अर्था्त मालवा का विजेता कहा गया है।
  • युवराज द्वितीय की मालवा के परमार नरेश मुन्ज द्वारा पराजित कर दिया गया, जिस कारण त्रिपुरी पर कुछ समय के लिए परमारों का अधिकार हो गया। इसके बाद इसी वंश का राजा  गांगेयदेव, जो प्रारंभ में चंदेल नरेश विद्याधर की अधीनता स्वीकर करता था विद्याधर की मृत्यु के बाद उसने अपने राज्य को स्वतंत्र घोषित कर दिया। उसने विक्रमादित्य की उपाधि भी धारण की थी। 12वीं शती के अंत तक इस वंश ने किसी न किसी प्रकार से महाकौशल में अपनी सत्ता कायम रखी। 13वीं  शती के प्रारंभ में इस वंश का अंतिम शासक विजयसिंह बना जो चंदेल शासक त्रैलोक्यवर्मन से पराजित हुआ। इस प्रकार त्रिपुरी को चंदेल राज्य में शामिल कर कल्चुरी-चेदि वंश को समाप्त कर दिया गया। 1305 ई. चंदेल वंश दिल्ली सल्तनत में शामिल कर लिया गया।

दिल्ली सल्तनत काल (1206 से 1526 ई.)

  • मध्य प्रदेश में 10वीं शताब्दी में ही आक्रमण प्रांरभ हो चुके थे जिसमें 1019 में महमूद गजवनी ने ग्वालियर भूभाग पर आक्रमण किया। दिल्ली सल्तनत के प्रारंभिक शासक ऐबक की महत्वपूर्ण विजयों में बंुदेलखण्ड की विजय शामिल थी।
  • कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु के बाद प्रतिहारों ने ग्वालियर, चंदेलों ने कालिंजर व अजयगढ़ पर अपना अधिकार कर लिया। इल्तुतमिश द्वारा 1231 ई. में ग्वालियर के किले पर आक्रमण कर विजय प्राप्त की गई।
  • 1233-34 ई. में कालिंजर व उसके आसपास के क्षेत्रों को जीता गया। 1234-35 में इल्तुतमिश द्वारा मालवा पर आक्रमण किया गया जिनमें उसने भिलसा व उज्जैन से काफी धन लूटा। 1305 ई. में अलाउद्दीन खिलजी ने मुल्तान के सूबेदार अईन-उल-मुल्क को मालवा पर आक्रमण हेतु भोज जिन्होंने आखिरकार वहाँ के राजा महलकदेव व उसके पुत्र को युद्ध में मारकर इस  क्षेत्र पर अपना अधिकार कर लिया। इसके बाद उन्होंने उज्जैन, धारानगरी व चंदेरी आदि को भी जीता। यहीं से पहली बार मालवा का दिल्ली सल्तनत में प्रवेश हुआ। 1401 ई. में दिलावर खाँ की मृत्यु के पश्चात्  यहाँ का शासक हुसैनशाह बना, जिसे गुजरात के शासक मुजफ्फरशाह द्वारा मालवा पर आक्रमण के फलस्वरूप कैद कर लिया गया परंतु मालवा में विद्रोह हो जाने के बाद मुजफ्फरशाह  ने हुसैनशाह को ही भेजा, जिन्होंने पुनः अपना अधिकार जमाया। इसके पश्चात् उन्होंने मण्डू को अपनी राजधानी बनाया। मण्डू नगर को बसाने का श्रेय भी उसी को ही है। इस वंश के शासक महमूदशाह द्वितीय के काल में गुजरात के शासक बहादुरशाह ने 1531 ई. में मालवा पर आक्रमण कर उसे जीत लिया।

मुगल काल (1526 से 1857 ई.)

  • 1526 ई. में मुगल सम्राट बाबर द्वारा दिल्ली सल्तनत के अंतिम शासक इब्राहिम लोदी (लोदी वंश) को हराकर भारत में मुगल साम्राज्य की नींव डाली गई। 29जनवरी, 1528 ई. को मालवा के सूबेदार मेदिनी राय की युद्ध में हत्या कर बाबर ने चंदेरी पर अपना अधिकार जमाया। बाबर की मृत्यु के बाद हुमायूँ मुगल सम्राट बना, जिसके समय में सम्पूर्ण मालवा जीतकर मुगल साम्राज्य में मिला लिया गया।
  • कन्नौज(1540 ई.) के विलग्राम के युद्ध में शेरशाह ने मुगल सम्राट  हुमायूँ को हराकर इस राज्य के माण्डू , उज्जैन, सारंगपुर आदि क्षेत्र पर अधिकार कर लिया।
  • शेरशाह ने 1545 ई. में बुदेलखण्ड के कालिंजर किले पर आक्रमण किया जिसमें बारूद फटने से उसकी मृत्यु हो गई। यह किला उस समय कीरत सिंह के कब्जे में था। शेरशाह द्वारा किया गया यह युद्ध रीवा के राजा वीरभान बघेला को कीरत सिंह द्वारा उसे न सौंपे जाने का एक बहाना मात्र था। शेरशाह की मृत्यु के पूर्व इस किले पर अफगानों को विजय मिल चुकी थी। मुगल सम्राट अकबर ने 1561 ई. में आधमखाँ को मालवा पर आक्रमण हेतु भेजा जहाँ उसे बाज बहादुर पर सफलता मिल गई। इस राज्य का गोंडवाना प्रदेश, जो रानी दुर्गावती के अधिकार क्षेत्र में था में अकबर ने युद्ध के लिए आसफ खाँ के नेतृत्व में मुगल सेना भेजी, जिसमें मुगल सेना की विजय हुई तथा रानी दुर्गावती (गोंडवाना) की पराजय हुई। उसने अपने सतीत्व की रक्षा हेतु स्वयं आत्महत्या कर ली। इसके पश्चात् गोंडवाना प्रदेश मुगल साम्राज्य में चला गया। अकबर ने 1569ई. में कालिंजर के किले पर अपना अधिकार कर लिया, उस समय यह किला, राजा रामचन्द्र के अधीन था। अकबर ने स्वयं 1601 ई. असीरगढ़ के किले पर अपना अधिकार जमाया। 1617 ई. में मुगल सम्राट जहाँगीर का दक्षिण की देखभाल हेतु स्वयं माण्डू जाना तथा खुर्रम का बुरहानपुर पहुँचना राज्य की महत्ता को स्पष्ट करता है।   
  • औरंगजेब की धार्मिक नीति के कारण मालवा व बंुदेलखण्ड में भी विद्रोह हुए, जिनमें बंुदेलखण्ड का विद्रोह सफल रहा। ओरछा के राजा चम्पत राय ने औरंगजेब के विरूद्ध विद्रोह का झण्डा खड़ा कर 1661 ई. मुगल आधिपत्य स्वीकार करने के बजाय आत्महत्या करना उचित समझा। इसके बाद उसका पुत्र छत्रसाल मुगलों की सेना में चला गया। वह जब मुगल सेना के साथ दक्षिण की तरफ विजय अभियान हेतु गया तो वह शिवाजी से प्रभावित होकर अपनी सेवाएँ उन्हें देनी अर्पित कर दी। उसने धमानी व कालिंजर पर अपना अधिकार जमाया। शिवाजी ने बंुदेलखण्ड में जाकर युद्ध प्रारंभ करने की सलाह दी। इस प्रकार 1705 ई. में औरंगजेब से उसे संधि करनी पड़ी परन्तु 1707 ई. में औरंगजेब की मृत्यु के बाद वह बंुदेलखण्ड का एक स्वतंत्र शासक बन गया और उसने पेशवा बाजीराव को बुंदेलखण्ड का पर्याप्त बड़ा भाग जागीर के रूप में दे दिया। यहीं से प्रदेश में मराठों का प्रवेश शुरू हुआ।

मराठा काल(1707 से 1818 ई.)
  • मुगल सम्राट फर्रूखसियर के विरूद्ध अपनी शक्ति को सुदृढ़ करने के लिए हुसैन अली (जो सैयद बन्धु का एक भाई था) ने मराठों से सहायता लेने के लिए एक संधि की जिसके अनुसार, खानदेश व गोंडवाना, जो मराठा शासकों द्वारा जीता गया था, को शाहू को सौंपे जाने की बात थी। यह स्थिति मराठा शासकों के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण व मुगल शासकों के लिए नुकसानदायक थी। 1722 ई. में बाजीराव ने मालवा पर प्रथम बार आक्रमण किया। इसके बाद 1724 ई. में इस भू-भाग में चौथ के लिए युद्ध किया। इसके पश्चात् पेशवा की तरफ से मल्हार राव होल्कर, रानोजी सिन्धिया व उदय पवार आदि लोगों ने मालवा की देखरेख में तीसरी बार आक्रमण किया और उसके बाद इस भू-भाग पर मराठों के निरंतर आक्रमण होते रहे। 1737 ई. में पेशवा बाजीराव से एक संधि करनी पड़ी, जो दुरई सराय की संधि के नाम से प्रसिद्ध थी।

अंग्रेजी काल

  • प्रथम आंग्ल मराठा युद्ध 1775-82 ई. तक चला। यह युद्ध अनिर्णायक समाप्त हुआ जिसके दरम्यान कंपनी व पेशवा के मध्य 1776 में पुरन्दर की संधि, 1779 में बड़गाँव की संधि व 1782 ई. में सालबाई की संधि हुई। अंततः माधव राव नारायण को अंग्रेजों द्वारा पेशवा मान लिया गया। उस समय अंग्रेज गवर्नर जनरल वॉरेन हेस्टिंग्स था। द्वितीय आंग्ल मराठा युद्ध 1803-06 ई. तक चला। इसमें अंग्रेजों का पक्ष भारी रहा। इस युद्ध के दौरान कंपनी द्वारा पेशवा से बेसीन की संधि 31.12.1802 की जिसके अनुसार पेशवा के द्वारा स्वीकार किए गए तथ्यों में मुख्य रूप से म.प्र. के ताप्ती व नर्मदा के मध्य भू-भाग को कंपनी को देने की बात थी। इस क्रम में कंपनी द्वारा भोंसले से 17.12.1803 ई. में देवगाँव की संधि, सिंधिया से सूरजी अर्जन गाँव की (30.12.1803) संधि की गई। वेलेज्ली के शासन काल में होल्कर 25.12.1805 से राजपुरघाट की संधि की गई, जिसमें मराठा सरदारों द्वारा चंबल का उत्तरी भू-भाग व बंुदेलखण्ड छोड़ दिया गया। 13जून 1817 को पेशवा ने कर्नल स्मिथ के द्वारा पूना अभियान के क्रम में पूर्णतया अपने हथियार डाल दिए तथा उसने एक नई संधि पर हस्ताक्षर किए।इस संधि के द्वारा म.प्र राज्य के मालवा व बुंदेलखण्ड के भाग कंपनी को दे दिये गये। लॉर्ड हेस्टिंग्स ने सितम्बर 1817 ई. में एक विशाल सेना के साथ कानपुर पहुँचकर सिन्धिया को संधि करने के लिए कहा, जिसे उसे अन्ततः विवश होकर स्वीकारना ही पड़ा। इस संधि की मुख्य शर्तों में उसे पिण्डारियों की सहायता बंद करने और उसको समाप्त करने में अंग्रेजों का साथ देना शामिल था। इसके लिए असीरगढ़ व सिंधिया के दुर्ग के भी उपयोग करने की बात कही गई थी। होल्कर ने 6.1.1818 को मंदसौर की संधि से खानदेश सहित नर्मदा के तट का समस्त क्षेत्र कंपनी को दे दिया। तृतीय आंग्ल मराठा युद्ध 1817-18 ई. तक चला। इसमें मराठों की पूर्णतया हार हो गई और उनका संपूर्ण साम्राज्य अंग्रेजी साम्राज्य में मिला गया। 1818 में पेशवा पद की समाप्ति हुई।

1857 का स्वतंत्रता संग्राम व मध्य प्रदेश

  • 10 मई 1857 मेरठ(उ.प्र.) से सैनिकों का विद्रोह स्वाधीनता संग्राम पांरभ।
  • 3 जून 1857 म.प्र. में प्रथमतः नीमच में विद्रोह फिर मदसौर, ग्वालियर में विद्रोह।
  • जुलाई 1857 में शिवपुरी, इंदौर महू व सागर में विप्लव।
  • दिल्ली के शाहजादा हुमायँू ने फिरोजशाह नाम से मंदसौर से स्वतंत्र राज्य स्थापित किया।
  • मुरार छावनी में विद्रोह 14 जून 1857
  • शिवपुरी 20 जून 1857
  • अमझेरा, सरदारपुरा तथा भोपावार में जुलाई 1857 में विद्रोह।
  • अगस्त 1857 में सागर व नर्मदा घाटी के समस्त प्रदेश में असैनिक विद्रोह।
  • ग्वालियर भू-भाग के विद्रोह का नेतृत्व राजा गंगाधर राव की विधवा झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई तात्या टोपे (22 मई, 1858 को काल्पी में) ने किया था। आखिरकार कुछ ही समय बाद 28 जून, 1858 ई. में अंग्रेजों द्वारा इन दोनों की संयुक्त सेना को हरा दिया गया। इस युद्ध में झाँसी की रानी  लड़ते-लड़ते वीरगति को प्राप्त हुईं व तात्या टोपे बच निकले। तात्या टोपे को सिंधिया के सामंत द्वारा पकड़कर अंग्रेजों को अप्रैल 1859 ई. में सौंप दिया गया जिसे अंग्रेजों ने शिवपुरी में फाँसी दी। इस घटनाक्रम में अंग्रेजी सत्ता की तरफ से सैनिक दस्ते का नेतृत्व सर हृाूरोज कर रहे थे।
  • म.प्र. में अंग्रेजों की खिलाफत सर्वप्रथम महाकौशल क्षेत्र में 1818 ई. में दिखाई दी जिसका नेतृत्व नागपुर के तत्कालीन देशभक्त शासक अप्पाजी भोंसले द्वारा किया गया क्योंकि अँग्रेजी सेना ने उनसे इस राज्य के मण्डला, बैतूल, छिंदवाडा, सिवनी व नर्मदा घाटी का भूभाग छोड़ देने हेतु बाध्य किया। इसी क्रम में अप्पा साहब द्वारा अरबी सैनिकों की सहायता से मुल्ताई(बैतूल) में अंग्रेजी सत्ता के विरूद्ध युद्ध किया गया। इस युद्ध में उन्हें पराजय हाथ लगी।
  • 1833 ई. में रामगढ़ नरेश जुझार सिंह के पुत्र देवनाथ सिंह ने अंग्रेजों के विरूद्ध खुला विद्रोह किया। अँग्रेजों के कठिन नीतियों व संधियों की रूपरेखा विचित्र होती जा रही थी। जिसके विरोध में भरहूत के मधुकरशाह, चन्द्रपुर (सागर) के जावहर सिंह बंुदेला, हीरापुर के किरेन शाह व मदनपुर के गोंड मुखिया दिल्हन ने 1842 ई. में बगावत की। इसी क्रम में सागर, दमोह, नरसिंहपुर, जबलपुर, मंडला व होशंगाबाद तक के सारे क्षेत्र में विरोध के नारे गुंजायमान थे। परंतु आपसी सामंजस्य न होने के कारण अंग्रेजों द्वारा इस विरोध की अग्नि को बुझाने में कोई दिक्कत नहीं हुई।
  • 3 जून 1857 ई. को नीमच के पैदल व घुड़सवार टुकडि़यों द्वारा रात्रि 9 बचे विद्रोह कर वहाँ की छावनी में आग लगा दी गई।
  • 14 जून, 1857 को ग्वालियर के निकट मुरार छावनी में सैनिक विद्रोह हुआ इस क्रम में सैनिकों द्वारा ग्वालियर व शिवपुरी के बीच की संचार व्यवस्था को भंग कर दिया गया जिस कारण मुम्बई आगरा की संर्पक लाइन भी बाधित हो गयी। ग्वालियर पर कुछ समय के लिए सैनिकों का अधिकार भी हो गया। संकट की इस घड़ी में ग्वालियर के महाराजा सिन्धिया द्वारा अपने परिवार के सदस्यों को आगरा भेज दिया गया।
  • रानी दुर्गावती के वंशज शंकरशाह व उसके पुत्र द्वारा गढ़ा मण्डला में स्वतंत्रता के लिए आवाजें बुलन्द की गईं। उन्हें तोपों से उड़ाया गया। इसी समय मण्डला के श्रीबहादुर व देवी सिंह ने भी विरोध के स्वर उठाये। श्री बहादुर व देवीसिंह को फाँसी पर लटका दिया गया।
  • 20 जून, 1857 को जब शिवपुरी में विरोध भड़का तो अंग्रेज अधिकारियों को डर से गुना भागना पड़ा। इसी बीच बंुदेलखण्ड के स्थानीय सैनिकों ने भी विद्रोह कर दिया और 1 जुलाई, 1857 ई. की सुबह सादत खाँ के नेतृत्व में इंदौर के लिए जा रही सेना पर विद्रोहियों द्वारा हमला किया गया जिनमें इन दोनों के बीच युद्ध हुआ। इसमें अंग्रेजी सेना को असफलता हाथ लगी। इस युद्ध में होल्कर ने भी विद्रोहियों का अप्रत्यक्ष रूप से साथ दिया। युद्ध की इस घड़ी में अँग्रेजों के सभी अधिकारी (कर्नल टेªर्वन, कैप्टन लुडओ, कैप्टन कीथ, कर्नल ड्यूरेण्ड) इन्दौर में ही मौजूद थे लेकिन विद्रोहियों के आक्रामक रूख के कारण वे सब अपने मित्रों व परिवार जनों के साथ सीहोर चले गए। यहाँ उनकी सहायता भोपाल की बेगम सिकन्दर द्वारा की गईं। कर्नल ड्यूरेण्ड होशंगाबाद के रास्ते पुनः महू छावनी में आये। इसके बाद महू में भी इसी वर्ष जुलाई में विरोध का बाजार गर्म हो गया। विरोध का स्वर जब सैनिकों के पास पहुँचा तो उन्होंने भी इसमें भरपूर साथ दिया। ऐसे समय में दिल्ली के शहजादा हुमायूँ ने मंदसौर जाकर बनावली, मेवाती व सिंधिया सेना के कुछ सैनिकों की सहायता से एक स्वतंत्र राज्य की स्थापना कर ली जो फिरोजशाह के नाम से मंदसौर का राजा बन गया।
  • मण्डलेश्वर की घुड़सवार व पैदल सेना की टुकड़ी ने यहाँ की केन्द्रीय जेल पर हमला बोल दिया। इस घटनाक्रम में बंगाल रेजिमेंट के कैप्टन बेंजामिन हेब्स मारे गये। यहाँ पर भीमा नायक के नेतृत्व में आदिवासी विद्रोह भी हुए थे, जिसे दबाने में अंग्रेजी सेना को कठिन मुकाबलों से गुजरना पड़ा। मंडला जिले की वीरांगानाओं में अवन्तिबाई का नाम प्रमुख रूप से लिया जाता है। अवन्तिबाई मंडला जिले की एक छोटी-सी रियासत रामगढ़ की रानी थीं। इन्होंने अँग्रेज सेनापति को क्षमादान देकर बड़ी भूल की थी क्योंकि वही व्यक्ति उनके बलिदान का कारण भी बना। ज्ञातव्य हो कि, रानी अवन्तिबाई के पति की मृत्यु के समय उनका पुत्र नाबालिग था। इस कारण अंग्रेजों द्वारा राज्य की देखभाल हेतु एक तहसीलदार की नियुक्ति की गई थी। यही वजह थी वह अँग्रेजों से सदैव नाराज रहती थी। रानी की सेना ने अपने मंडला पर पड़ी अँग्रेजों की राज्य हड़प नीति की निगाह को भाँपकर उन्हें अँग्रेजों से मुक्त कराने का संकल्प लिया। इसके लिए उसने मंडला की सीमा पर खेड़ी गाँव में अपना मोर्चा स्थापित किया एवं सेनापति वार्डन को क्षाम माँगने हेतु मजबूर कर दिया। इसके बाद रानी रामगढ़ आयी, जहाँ उसने तहसीलदार की हत्या कर अपने राज्य पर अधिकार कर लिया लेकिन इसी बीच वार्डन से संगठित सेना के साथ दिसम्बर 1857 ई. में रामगढ़ पर चढ़ाई कर दी। तीन माह के कड़े संघर्ष के बाद व रीवा राज्य की अतिरिक्त सैन्य व्यवस्था का साथ लेने के बाद रानी पर पुनः आक्रमण तेज कर दिया। इधन रानी के पास सैनिकों व उसके लिए रसद की कमी थी। अतएव वह रामगढ़ छोड़कर देवहारगढ़ के जंगल की ओर चल पड़ी। जब सेनापति वार्डन को यह पता चला तो वह भी सैन्य बल के साथ इसी ओर चल पड़ा। जंगल में दोनों के बीच युद्ध प्रारंभ हो गया। जब रानी को लगा कि वह स्वयं पकड़ी जा सकती है तो उसने अपनी अंगरक्षिका गिरधारी बाई से कटार लेकर आत्महत्या कर ली तथा गिरधारी बाई ने भी ऐसा ही किया।

स्वतंत्रता आंदोलन
  • देश में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का 1885 ई. में गठन मुम्बई में किया गया। यह संस्था लोगों में राजनैतिक सचेतना का मार्ग प्रशस्त करने लगी। कांग्रेस का दूसरा अधिवेशन जो 1886 में कोलकाता में दादाभाई नौरोजी की अध्यक्षता में संपन्न हुआ, मध्य भारत के नेताओं में बापूराव, दादाकिन खेड़े, गंगाधर चिटनिस व अब्दुल अजीज आदि ने भाग लिया था। जब 1891 ई.  में कांग्रेस का सातवाँ सम्मेलन इस क्षेत्र के भूभाग (नागपुर) में हुआ तब इस क्षेत्र के लोगों में राष्ट्रीय चेतना के प्रति जागरूकता आई। बाल गंगाधर तिलक के प्रभाव में मध्य भारत, मालवा आदि क्षेत्रों में गणेश उत्सव, शिवाजी उत्सव आदि के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना का प्रचार किया जाने लगा। इसी बीच खांडवा से सुबोधसिन्धु व जबलपुर से जबलपुर टाइम्स का प्रकाशन प्रारंभ किया गया। इसके इस राज्य में राष्ट्रीयता के प्रचार क्षेत्र में अभिवृद्ध होने लगी। पं. माखनलाल चतुर्वेदी ने अपने पत्र कर्मवीर के माध्यम से इसके प्रचार में नई दिशा दी। 1899 के लाहौर कांग्रेस अधिवेशन में इस राज्य के डॉ. हरिसिंह गौड़ ने नये विभाग तथा प्रशासन को पृथक्-पृथक् रखने की माँग उठायी। 1904 ई. में अंग्रेजी शिक्षा पद्धति का कड़े शब्दों में विरोध किया। 1907 में जबलपुर में एक क्रांतिकारी दल का गठन किया गया। 1923 में जबलपुर सत्यग्रह प्रांरभ हुआ जिसके बाद ही यह संपूर्ण राज्य में इस सत्याग्रह का नेतृत्व देवदास गाँधी, राजगोपालाचार्य तथा डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने किया। यहाँ पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने के कारण सुन्दरलाल  को 6 माह की कारावास की सजा दी गईं। जबलपुर के ही सेठ गोविन्ददास व पंडित द्वारिका प्रसाद मिश्र के नेतृत्व में 6 अप्रैल 1930 को नमक सत्याग्रह की शुरूआत की गई। यहीं पर इस वर्ष प्रांरभ हुए जंगल सत्याग्रह का भी श्रीगणेश हुआ। जिसकों सेठ गोविंद दास, माखनलाल चतुर्वेदी व पं. रविशंकर शुक्ल पं. द्वरिका प्रसाद मिश्र व विष्णु दयाल भार्गव आदि नेताओं को गिरफ्तार कर उन पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया। 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध के प्रांरभ हो जाने पर यहीं से गाँधी जी द्वारा व्यक्तिगत अवज्ञा आंदोलन की शुरूआत की गई।
  • राज्य के सिवनी जिले में 1961 ई. में स्वतंत्रता आंदोलन प्रांरभ हुआ। 1920-20 में इस राज्य में कांग्रेस व खिलाफत आंदोलन की शुरूआत साथ-साथ की गई जिसमें कांग्रेस की बागडोर प्रभाकर डुण्डीराज जटार व खिलाफत का नेतृत्व अब्दुल जब्बार खाँ ने किया। 1923 के नागपुर के झण्डा सत्याग्रह का नेतृत्व महात्मा भगवानदीन एवं पूरनचन्द राका ने किया। नमक सत्याग्रह में इस जिले के दुर्गाशंकर मेहता ने गाँधी चौक पर नमक बनाकर सत्याग्रह की शुरूआत की। यहाँ जेल में बंद स्वतंत्रता सेनानियों में सुभाषचन्द्र बोस, आचार्य विनोबा भावे, पंडित द्वरिका प्रसाद मिश्र शरद चंद्र बोस व एच.वी.कामथ प्रमुख थे।
  • 1922 ई. में राज्य की भोपाल रियासत की सीहोर कोतवाली के सामने विदेशी फेल्ट केप की होली जलाई गई। भोपाल में 1938 ई. में भोपाल राज्य प्रजामण्डल की स्थापना की गई, जिनमें मौलाना तरजी मशरिकी को सदर व चतुर नारायण मालवीय को मंत्री के रूप में चुना, जिन्होंने खुले अधिवेशन में नागरिक स्वतंत्रता के माँग संबंधी प्रस्ताव को प्रस्तुत किया।
  • बैतूल जिले के घोड़ा-डोगरी के आदिवासियों ने भी नमक आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1930 ई. में जंगल सत्याग्रह के आहृान पर इस अंचल का हरेक आदिवासी ब्रिटिश साम्राज्य को कड़ी चुनौती प्रस्तुत करने के लिए पहाड़ों व जंगलों की ओर साज-ओ-सामान के साथ कूद पड़ा था, जिसका नेतृत्व शाहपुर के निकट स्थित बंजारी सिंह कोरकू द्वारा किया गया।
  • रतलाम में 1920 ई. में कांग्रेस समिति की स्थापना की गई तथा इसके प्रथम अध्यक्ष के रूप में मोहम्मद उमर खान को नामित किया गया। यहाँ से राष्ट्रीय आंदोलन का सूत्रपात स्वामी ज्ञानानंद की प्रेरणा से हुआ। यहाँ पर 1931 ई. में महिला सेवादल तथा 1935 ई. में प्रज्ञा परिषद की स्थापना की गई।
  • झाबुआ जिले में 1934 ई. में प्रजामंडल की सहायता से विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार, शराब बंदी व हरिजन उद्धार संबंधी आंदोलन प्रांरभ किये गये जिसमें अँग्रेजी हुकूमत द्वारा इन स्वतंत्रता सेनानियों पर कहर बरसाये गये तथा इन्हें जेल में बंद कर कष्टप्रद यातनाएँ दी गईं इसी वर्ष भोपाल रियासत में मौलाना तर्जी मशरिकी खान व शाकिर अली खान के नेतृत्व में अन्जुमन खुद्दाम-ए-वतन तथा मास्टर लाल सिंह, लक्ष्मीनारायण सिंथल, डॉ, जमुना प्रसाद मुखरैया, पं. उद्धवदास मेहता, पं. चतुर नारायण मालवीय के नेतृत्व में भोपाल राज्य हिन्दू सभा की नींव डाली गयी। इसके फलस्वरूप यहाँ की जनता में स्वतंत्रता आंदोलन हेतु नई चेतना को दिशा मिली। हिन्दू सम्मेलन के लिए मास्टर लाल सिंह लक्ष्मी नारायण सिंघल, पं. उद्धवदास मेहता व डॉ. मुखरैया को 1937 में जेल की सजा हुई। 
  • 2 अक्टूबर, 1942 ई. को मंडलेश्वर जेल में बंद क्रांतिकारियों द्वारा रात्रि में मुख्य द्वार का ताला तोड़ दिया गया तथा उनके विरूद्ध विद्रोह का प्रदर्शन किया गया तथा बाद में एक सभा भी आयोजित की गईं। तत्पश्चात् ये लोग अँग्रजी सेना द्वारा पुनः पकड़ लिए गए। जनवरी 1939 में इस राज्य के त्रिपुरी नामक स्थान में राष्ट्रीय कांग्रेस का अधिवेशन सम्पन्न हुआ, जिनमें महात्मा गाँधी के विरोध के बावजूद भी सुभाष चंद्र बोस को इसका अध्यक्ष चुना गया, जिन्होंने अप्रैल 1939 में इस्तीफा दे दिया। जब देश 15 अगस्त, 1947 ई. को स्वतंत्र हुआ तब मध्य भारत व उसके अंतर्गत की सभी रियासतों को मिलाकर मध्य प्रांत नामक राज्य बना तथा पन्ना, छतपुर व रीवा क्षेत्र को मिलाकर विंध्य प्रदेश भोपाल व महाकौशल तथा छत्तीसगढ़ के भूभाग को मिलाकर म.प्र. बनाया गया।

1857 व उसके पूर्व के प्रमुख विद्रोही
  • 1842  जवाहर सिंह बंुदेला, चंद्रपुर।
  • शेख रमजान  अश्वारोही सैन्य टुकड़ी ने सागर में विद्रोह किया।
  • शंकरशाह  इन्होंने तथा इनके पुत्र ने गढ़ा मण्डला की स्वतंत्रता के लिए हथियार उठाया था। इन्हें तोप से उड़ा दिया गया।
  •  राजा ठाकुर प्रसाद  राघवगढ़ के किशोर राजा(आजीवन कारावास)।
  • नारायण सिंह- रायपुर  के जमींदार नारायण सिंह ने
  • (सोनाखान)- स्वतंत्रता के लिए हथियार उठाया था। इन्हें फाँसी की सजा मिली।
  • शहादत खान - इंदौर के समीप महू की छावनी में इन्होंने अँग्रेजों के विरूद्ध विद्रोह का बिगुल बजाया।
  •  रानी लक्ष्मीबाई कालपी में तात्या टोपे व रानी की संयुक्त सेना ने हृाूरोज पर हमला बोला।
  • सुरेन्द्र साय संबलपुर राज्य के शासक, जिन्होंने अंत तक अँग्रेजों के खिलाफ विद्रोह जारी रखा।
  • (उड़ीसा)
  • तात्या टोपे- नाना साहेब के साथ मिलकर संघर्ष किया। इन्हें शिवपुरी में फाँसी दी गई।
  • भीमा नायक - जनजातियों के विद्रोह का नेतृत्व किया।
  •  रानी अवंतीबाई - मण्डला जिले की रियासत रामगढ़ की रानी, जिन्होंने अँग्रेजों से जमकर लोहा लिया और अंततः पराजित होने पर आत्मोत्सर्ग कर लिया।

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