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पाल वंश,सेन वंश,राष्ट्रकूट,कलचुरी,गुजरात का सोलंकी वंश

पाल वंश
  • पाल वंश ने बंगाल में शासन किया। पश्चिम बंगाल को ‘ गौड़ ‘ एवं पूर्वी बंगाल को ‘ बंग कहा जाता था।
  • पाल वंश बंगाल पर अधिकार होने से पहले वहां अराजकता एवं अशांति का माहौल था, जिसे ‘ मत्स्य न्याय ‘ कहते थे।
  • पाल वंश का संस्थापक गोपाल ( 750-770 ई. ) था। गोपाल के ओदंतपुरी के प्रख्यात मंदिर का निर्माण करवाया।
  • गोपाल के बाद धर्मपाल ( 770-801ई. ) शासक बना। इसके शासनकाल में ही कन्नौज के त्रिपक्षीय संघर्ष की शुरूआत हुई।
  • धर्मपाल बौद्ध धर्म का अनुयायी था तथा इसने ही विक्रमशिला विश्वविद्यालय की स्थापना की। इसने बौद्ध लेखक हरिभद्र को संरक्षण भी दिया।
  • रामपाल ( 1077-1120 ई. ) पालों का अंतिम शक्तिशाली शासक था। इसके समय संध्याकर नंदी ने रामपालचरित नामक पुस्तक लिखी।
  • रामपाल के समय ‘ कैवर्त ‘ केे किसानों का विद्रोह हुआ।
  • मदनपाल पाल वंश का अंतिम शासक था।
सेन वंश
  • पालों के बाद बंगाल में सेनवंश का शासक स्थापित हुआ। इस वंश का संस्थापक सामंतसेन था। सामंतसेन से  राढ़ में राज्य की स्थापना की थी।
  • विजयसेन ( 1095-1158 ई. ) ने दो राजधानियों-प. बंगाल में ‘ विजयपुरी ‘एवं पूर्वी बंगाल में ‘ विक्रमपुरी ‘ की स्थापना की थी।
  • विजयसेन ने देवपाडा में प्रद्युम्नेश्वर ( शिव ) का एक विशाल मंदिर बनवाया। इसी मे समय कवि धायी ने देवपाड़ा प्रशस्ति लेख लिखा। कवि श्रीहर्ष ने विजयसेन की प्रशंता में विजय प्रशस्ति लिखी।
  • बल्लालसेन (1158-1178  ई. ) एक विद्वान, विद्या प्रेमी एवं विद्वानों का संरक्षक था। उसने स्वयं चार ग्रंथ लिखे, जिनमें से दानसागर एवं खगोल विज्ञान पर अवधूत सागर अब भी विद्यमान है।
  • बल्लालसेन ने कुलीवाद के नाम से एक सामाजिक आंदोलन भी चलाया था, जिसका उद्देश्य वर्ण व्यावस्था या जाति कुलीनता या रक्त की शुद्धता को बनाये रखना था।
  • बल्लालसेन के बाद उसका पुत्र लक्ष्मणसेन ( 1178--1205 ई. ) शासक बना। उसके बंगाल की प्राचीन राजधानी गौड़ केे पास एक राजधानी ‘लक्ष्मणवती ‘( लखनौती ) की स्थापना की।
  • लक्ष्मणसेन के दरबार में कई प्रसिद्ध विद्वान थे, जैसे-बंगाल के प्रसिद्ध वैष्णव कवि एवं गीत-गोविंद के रचयिता ‘ जयदेव ‘ हलायुद्ध एवं  पवनदूत के लेखक ‘ धायी ‘ एवं आर्यसप्तमी के लेखक ‘ गोवर्द्धन‘।
  • अंत मे सेन राज्य, देव वंश के अधीन हो गया।
राष्ट्रकूट
  • राष्ट्रकूट की वंश की संस्थापक दन्तिदुर्ग था। इसके बाद कृष्ण प्रथम शासक बना। इसी के शासनकाल में ऐलोरा के प्रसिद्ध ‘ कैलाश मंदिर ‘ का निर्माण हुआ था।
  • गोविंद द्वितीय, ध्रुव,गोविंद तृतीय तथा अमोघवर्ष भी प्रसिद्ध राष्ट्रकूट शासक थेे।
  • अमोघवर्ष ने मान्यखेत ‘ नामक नगर की स्थापना की तथा उसे अपनी राजधानी बनाया। प्रसिद्ध जैन आचार्य जिनसेन इसके गुरू थे।
  • अरब यात्री सुलेमान ने 851 ई. में अमोघवर्ष का उल्लेख ‘ बलहरा ‘ नाम से किया।
  • कर्क द्वितीय अंतिम राष्ट्रकूट शासक था।
  • कल्याणी के चालुक्य शासक तैलप द्वितीय ने राष्ट्रकूट वंश को समाप्त कर उसे अपने राज्य में मिला लिया।

गुजरात का सोलंकी वंश
  • गुजरात के सोलंकी वंश स्थापना मूलराज प्रथम ( 941-995 ई. ) ने की थी।
  • भीमदेव प्रथम इस वंश का सबसे शक्तिशाली राजा था। भीम के समय में ही गुजरात में मशहूर गजनवी का आक्रमण हुआ तथा उसने सोमनाथ के मंदिर को लूटा। भीम प्रथम ने भट्टारिका तथा पत्तनदेव में मंदिरों का निर्माण करवाया। उसके सामंत विमल ने आबू पर्वत पर दिलवाड़ा के प्रसिद्ध मंदिर बनवाये।
  • जयसिंह सिद्धराज ( 1094-1143 ई. ) इस वंश का प्रतापी राजा था। यह विद्या का महान संरक्षक था। उसने जैन विद्वान हेमचंद्र को
  • संरक्षण दिया। जयसिंह ने आबू पर्वत पर एक मंडप तथा सिद्धपुर में रूद्रमहाकाल के मंदिर का निर्माण करवाया।
  • भीमदेव द्वितीय
  • के समय 1178 ई. में मुसलमानों ने आक्रमण किया। यह गुजरात के सोलंकियों का अंतिम शासक था।
  • भीमदेव द्वितीय के बाद उसके एक मंत्री लवणप्रसाद ने गुजरात में बंघेल वंश की स्थापना की। 1240 ईस्वी के लगभग उसके उत्तराधिकारियों ने अन्हिलवाड़ पर कब्जा कर लिया। बघेल वंश ने गुजरात के स्वतंत्र हिंदू राज्य को दिल्ली सल्तनत में मिला लिया गया।


राष्ट्रकूट वंश विस्तार से 


  • राष्ट्रकूट की उत्पत्ति और मूल निवास के विषय में विद्वानों में मतभेद है। डॉ. फ्लीट का विचार है कि राष्ट्रकूट उत्तर के राठौरों के वंशज थे। इसके विपरीत बर्नेल का विचार है कि उनका सम्बन्ध आन्ध्र प्रदेश के द्रविड़ रेड्डियों से है। रेड्डी शब्द राष्ट्र का अपभ्रंश है और इस प्रकार राष्ट्रकूट रेड्डियों के वंशज हैं। इन दोनों मतों को अधिक मान्यता प्राप्त नहीं है।
  • एक अन्य सम्भावना यह है कि राष्ट्रकूट मान्यखेट के राष्ट्रिकों या राठिकों के वंशज थे। राष्ट्रिकों का वर्णन अशोक के अभिलेख में भी मिलता है। राष्ट्रकूटों की भाषा कन्नड़ थी और इन्होंने कन्नड भाषा को राजाश्रय प्रदान किया। कई अभिलेखों में उन्हें लट्टलूरपुर-वराधीश अर्थात् सुन्दर नगर लातूर का स्वामी कहा गया है। लातूर निजाम की रियासत का एक छोटा सा नगर था। कुछ विद्वानों का यह भी विचार है कि मान्यखेट के राष्ट्रकूट महाराष्ट्र के निवासी थे। राष्ट्रकूटों ने यह भी दावा किया कि वे महाभारत काल के यदुवंशी कृष्ण के वंशज हैं।
  • नर्मदा नदी के दक्षिण में एक शक्तिशाली राज्य का उदय हुआ जिसके राजा राष्ट्रकूट कहलाये। राष्ट्रकूट राजा पहले चालुक्यों के सामन्त थे। राष्ट्रकूट राजा दन्तिदुर्ग ने चालुक्य राजा कीर्तिवर्मा द्वितीय के विरुद्ध विद्रोह कर दिया और अपनी स्वतन्त्रता की घोषणा कर दी। मान्यखेट के राष्ट्रकूटों का महत्त्वपूर्ण काल दन्तिदुर्ग के शासन-काल से ही प्रारम्भ हुआ। उसने 8वीं शताब्दी के मध्य चालुक्य-शक्ति का अन्त करके अपनी शक्ति का विस्तार किया। उसने कांची के पल्लवराज, कंलिगराज, कौशलराज, मालव (उज्जैन का गुर्जर-प्रतिहार नरेश), लाट (दक्षिण गुजरात) और श्री शैल (कर्नूल जिला) के राजाओं को पराजित किया। उसने उज्जैन में हिरण्यगर्भ यज्ञ किया। जिसमें प्रतिहार राजा ने द्वारपाल का कार्य किया। दन्तिदुर्ग ने महाराजाधिराजपरमेश्वर और परमभट्टारक की उपाधियाँ धारण की। दन्तिदुर्ग ने अरब आक्रमण को विफल बनाया जिसके बाद चालुक्य शासक विक्रमादित्य ने उसे पृथ्वी वल्लभ की उपाधि दी।
  • दन्तिदुर्ग के कोई पुत्र नहीं था। उसके बाद उसका चाचा कृष्ण प्रथम 758 ई. में सिंहासनारूढ़ हुआ। कृष्ण प्रथम ने चालुक्य शक्ति को, जिसका विनाश दन्तिदुर्ग ने किया था, पूर्णरूपेण पराजित किया। उसने अपने पुत्र गोविन्द द्वितीय को एक सेना के साथ वेगी के चालुक्य राजा पर आक्रमण करने भेजा। वेंगी के चालुक्य राजा ने आत्मसमर्पण कर दिया। कृष्ण प्रथम (758-773 ई.) एक महान् विजेता ही नहीं, एक महान् निर्माता भी था। एलोरा में ठोस चट्टान को कटवाकर उसने शिव मन्दिर (कैलाशनाथ) का निर्माण कराया। उसने राजाधिराज परमेश्वर की उपाधि ली।
  • कृष्ण प्रथम के पश्चात् उसका पुत्र गोविन्द द्वितीय शासक बना। वह विलासी था और उसके छोटे भाई ध्रुव ने सिंहासन पर अधिकार कर लिया। ध्रुव ने पल्लव नरेश दन्ति वर्मन् को पराजित किया। ध्रुव गुर्जर प्रतिहार राजा वत्सराज और पाल राजा धर्मपाल का समकालीन था। ध्रुव ने अपनी सैनिक गतिविधियां उत्तर भारत तक बढ़ा दी। उसने वत्सराज और धर्मपाल दोनों को युद्ध में पराजित किया। इन विजयों के फलस्वरूप यद्यपि राष्ट्रकूट साम्राज्य की सीमा में वृद्धि नहीं हुई, परन्तु इससे ध्रुव की प्रतिष्ठा बहुत बढ़ गई और गंगा-यमुना के दोआब में राजनैतिक प्रभुत्व स्थापित करने के लिए राष्ट्रकूटों, पालों और प्रतिहारों में पारस्परिक संघर्ष प्रारम्भ हो गया। ध्रुव ने निरूपम, कालीवल्लभ और धारावर्ष की उपाधि ली।
राष्ट्रकूट राजा गोविन्द तृतीय (793-814 ई.)

  • ध्रुव ने अपने शासनकाल में अपने तृतीय पुत्र गोविन्द को युवराज घोषित कर दिया था। 793 ईं में ध्रुव के पश्चात् गोविन्द तृतीय राजा बना। परन्तु उसके सिंहासन पर अधिकार को, उसके भाई स्तम्भ ने जो गंगवाड़ी का राज्यपाल था, चुनौती दी। उसने बारह राजाओं का संघ बनाया और गोविन्द तृतीय के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया। गोविन्द तृतीय ने स्तम्भ को राजाओं के संघ के साथ पराजित कर दिया। परन्तु गोविन्द तृतीय ने अपने शत्रुओं के प्रति उदारता का परिचय दिया। उसने अपने भाई स्तम्भ को गंगावाड़ी का पुनः राज्यपाल बनाया। मालवा को जीतकर उसने उपेन्द्र नामक व्यक्ति को शासक नियुक्त किया।
  • गोविन्द तृतीय ध्रुव के समन ही एक महँ विजेता था। उसने पूर्ण तैयारी के साथ उत्तरी भारत पर आक्रमण किया। वह भोपाल और झाँसी के मार्ग से आगे बाधा। गुर्जर राजा नाग्भात्त द्वितीय ने उसका सामना किया। नागभट्ट द्वितीय पराजित हुआ और युद्धस्थल से भाग गया। गोविन्द तृतीय कन्नौज की ओर बढ़ा। कन्नौज के राजा चक्रयुद्ध ने उसके सामने आत्मसमर्पण कर दिया। बंगाल के राजा धर्मपाल ने भी उसकी अधीनता स्वीकार कर ली। मालवा के शासक ने गोविन्द की अधीनता स्वीकार कर ली। गोविन्द तृतीय ने गुजरात पर विजय प्राप्त की और वहां का राज्य अपने भाई इन्द्रराज को सौंप दिया।
  • जब गोविन्द तृतीय उत्तर भारत के विजय अभियान पर था, तब गंग, केरल, पाण्ड्य और पल्लव राजाओं ने उसके विरुद्ध षड्यन्त्र रचा। गोविन्द तृतीय ने उत्तर भारत के विजय अभियान से लौटकर इन्हें करारी पराजय दी। गोविन्द तृतीय के विजय अभियानों की जानकारी से लंका का राजा भयभीत हो गया और उसने गोविन्द तृतीय की अधीनता स्वीकार कर ली।
  • अमोघवर्ष (814-878 ई.)- गोविन्द तृतीय की मृत्यु के पश्चात् अमोघवर्ष सिंहासन पर बैठा। उसने नई राजधानी मान्यखेत की स्थापना की। राज्याभिषेक के समय उसकी आयु 12 वर्ष थी। उसकी अल्पावस्था का लाभ उसके विरोधियों ने उठाया। सामन्तों ने विद्रोह कर दिया। मंगवाड़ी के शासक ने अपने को स्वतन्त्र घोषित कर दिया। वेंगी के राजा विक्रमादित्य द्वितीय ने बदला लेने के लिए राष्ट्रकूट साम्राज्य पर आक्रमण कर दिया। अमोघवर्ष को सिंहासन से हाथ धोना पड़ा। कुछ समय पश्चात् उसने पुनः सिंहासन पर अधिकार कर लिया।
  • अमोघवर्ष साहित्य प्रेमी और विद्वानों का आश्रयदाता था। अमोघवर्ष ने कन्नड़ भाषा में कविराज मार्ग की रचना की। उसने जिनसेन(लेखक-आदिपुराण) महावीराचार्य और शकतायन को राज्य संरक्षण प्रदान किया।
  • कृष्ण द्वितीय (878-914 ई.)- अमोघवर्ष के पश्चात् उसका पुत्र कृष्ण द्वितीय राजा बना। उसे अपने पड़ोसी राज्यों से लगातार संघर्ष करना पड़ा। उसके महत्त्वपूर्ण युद्ध प्रतिहारों और चालुक्यों के साथ हुए।
  • कृष्ण द्वितीय के उत्तराधिकारी- कृष्ण द्वितीय के पश्चात् उसका पौत्र इन्द्र तृतीय (914-922 ई.) शासक बना। उसने प्रतिहारों के साथ युद्ध किया। उसने कन्नौज पर भी आक्रमण किया और सफलता प्राप्त की।
  • इन्द्र तृतीय के पश्चात् अमोघवर्ष द्वितीय, गोविन्द चतुर्थ और अमोघवर्ष तृतीय शासक बने। कृष्ण तृतीय (939-968 ई.) राष्ट्रकूट वंश का महान् शासक हुआ है जिसका काल संघर्ष में व्यतीत हुआ। उसने अकालवर्ष की उपाधि ग्रहण की। उसने चोलों को करारी पराजय दी। वहां उसने एक देवालय एवं विजय-स्तंभ की स्थापना की। सुदूर दक्षिण में राज्यों पर विजय प्राप्त की। लंका के राजा को भी उसने अपनी अधीनता स्वीकार करने पर विवश किया। कृष्ण तृतीय के उत्तराधिकारी अयोग्य सिद्ध हुए और उस राज्य का शीघ्रता से पतन होने लगा। इस वंश के अन्तिम राजा कर्क को उसके एक सामन्त तैल या तैलप ने 973 ई. में गद्दी से उतार कर अपना अधिकार कर लिया। तैल ने कल्याणी के चालुक्य राजवंश की नींव डाली। अलमसूदी (1915-16 ई.) ने राष्ट्रकूट शासकों की बडी प्रशंसा की है और उसने इनकी तुलना विश्व के 4 शासकों से की है। तीन अन्य हैं- (1) बगदाद के खलीफा, (2) चीन और (3) कुस्तुनतुनिया के शासक।
राष्ट्रकूट-प्रशासन-

  • राष्ट्रकूट काल में प्रशासन का केन्द्र-बिन्दु राजा था। सारे अधिकार राजा में निहित थे। वह परम भट्टारक, महाराजाधिराज की उपाधियां धारण करता था। राजा का पद वंशागत था और राजा की मृत्यु के पश्चात् ज्येष्ठ पुत्र सिंहासन पर बैठता था, परन्तु कभी-कभी अपवाद भी होते थे, जैसे बड़े-भाई के होते हुए गोविन्द तृतीय को उसके पिता ने अपने जीवन-काल में ही राजा मनोनीत किया था। युवराज प्रशासन में राजा की सहायता करता था। राजकुमारों को आमतौर पर राज्यों का राज्यपाल नियुक्त किया जाता था। प्रशासन में परामर्श और सहायता देने के लिए राजा मत्रियों की नियुक्ति करता था। प्रशासन की सबसे छोटी इकाई ग्राम थी। ग्राम-प्रमुख ग्राम का प्रशासन चलाता था। गांव में शान्ति-व्यवस्था बनाये रखना उसी का कार्य था। ग्राम में स्वच्छता, सिंचाई, शिक्षा, मन्दिरों और तालाबों की देख-रेख के लिए उपसमितियां होती थीं जो ग्राम प्रमुख की देखरेख में कार्य करती थीं।
  • राष्ट्रकूट शासक सेना के संगठन और ट्रेनिंग पर विशेष रूप से ध्यान देते थे। सेना स्थायी थी। सेना का एक बड़ा भाग राजधानी में रहता था।
धर्म-

  •  राष्ट्रकूट शासक शिव और विष्णु के उपासक थे। उनकी मुहरों पर विष्णु के वाहन गरुड़ अथवा योगमुद्रा में आसीन शिव के चित्र अंकित हैं। शासकों ने अनेक यज्ञ कराये जैसे दन्तिदुर्ग ने उज्जैन में हिरण्यगर्भ यज्ञ किया। एक ही मन्दिर में विभिन्न देवी-देवताओं की प्रतिमाएं स्थापित की जाती थी, जैसे ब्रह्मा, विष्णु और महेश। हिन्दू-धर्म के अतिरिक्त जैन सम्प्रदाय के प्रति भी राष्ट्रकूट शासकों ने उदार दृष्टिकोण अपनाया। अमोघवर्ष प्रथम, इन्द्र द्वितीय, कृष्ण द्वितीय और इन्द्र तृतीय ने जैन-धर्म को संरक्षण प्रदान किया।
  • कला एवं साहित्य- कुछ राष्ट्रकूट शासकों ने कला के विकास में भी अपना योगदान दिया। कृष्ण प्रथम ने चट्टानों को कटवाकर एलोरा के विशाल कैलाश-मन्दिर का निर्माण करवाया जो कला की एक अद्भुत कृति है।
  • राष्ट्रकूट शासकों ने साहित्य को भी प्रोत्साहन प्रदान किया। उन्होंने शिक्षण संस्थाओं के लिए प्रचुर मात्रा में दान दिया। उन्होंने कवियों और साहित्यकारों को अपने दरबार में राजाश्रय प्रदान किया। अमोघवर्ष ने काव्यशास्त्र पर कविराज मार्ग नामक पुस्तक की रचना की। उसके शासन-काल में शाक्तायन ने अमोघवृति की रचना की। पोन्ना ने शान्ति पुराण लिखा। पम्पा ने कृष्ण तृतीय के शासन-काल में भारत की रचना की। इस प्रकार राष्ट्रकूट काल में साहित्य के क्षेत्र में विशेष प्रगति हुई।

बंगाल का सेन-वंश {Sen-dynasty of Bengal}

  • 12वीं सदी के अंत तक बंगाल में पाल के स्थान पर सेन वंश स्थापित हो गया।
  • सेन शासक बल्लाल सेन ने दान सागर एवं अद्भूत सागर ग्रंथों की रचना की।
  • लक्ष्मणसेन के दरबार में गीतगोविंद के लेखक जयदेव तथा ‘ब्राह्मण सर्वस्व’ के लेखक हलायुध् रहते थे।
  • सेन-वंश का मूल-सामन्तसेन को, जिसने बंगाल के सेन वंश की नीव डाली थी, कर्नाटक क्षत्रिय कहा गया है।
  • सेन वंश के लोग सम्भवत: ब्राह्मण थे किन्तु अपने सैनिक-कर्म के कारण वे बाद में क्षत्रिय कहे जाने लगे। इसलिए उन्हें ब्रह्म क्षत्रिय भी कहा गया है। 
  • पाल साम्राज्य के केन्द्रीय भग्नावशेष पर ही सेनों के राज्य की भित्ति खड़ी हुई
  • विजयसेन (1095-1158 ई.)- सामन्तसेन का उत्तराधिकारी हेमन्त सेन था। वंश के संस्थापक सामन्तसेन के पौत्र विजयसेन ने अपने वंश के गौरव को बढ़ाया। उसने 64 वर्षों तक राज्य किया। विजय सेन ने बंगाल से वर्मनों को निकाल बाहर किया। उत्तरी बगाल से मदनपाल को निर्वासित करने वाला भी विजयसेन ही था। कहा जाता है कि उसने नेपाल, आसाम और कलिंग पर विजय प्राप्त की। रामपाल की मृत्यु के बाद, पाल साम्राज्य के ध्वंसावशेष पर विजयसेन ने जिस राज्य की स्थापना की उसमें पूर्वी, पश्चिमी और उत्तरी बंगाल के भाग सम्मिलित थे। उसने परम माहेश्वर की उपाधि ग्रहण की जिससे स्पष्ट सिद्ध होता है कि विजयसेन शैव था। सैन्य विजयों के साथ-साथ उसने सांस्कृतिक और धार्मिक कार्य भी किये। उसने शिवमन्दिर का निर्माण कराया, एक झील खुदवाई, विजयपुर नामक नगर बसाया और उमापति को राज्याश्रय प्रदान किया। पूर्वी बंगाल में विक्रमपुर संभवत इस वंश की दूसरी राजधानी थी। इन्हीं उपलब्धियों के कारण विजयसेन को सेन वंश का वास्तविक संस्थापक कहा जाता है।
  • बल्लाल सेन (1158-1179 ई.) बल्लाल सेन एक विचित्र शासक था। बंगाल के ब्राह्मणों और अन्य ऊंची जातियों में उसे इस बात का श्रेय दिया गया है कि आधुनिक विभाजन उसी ने कराये थे। बल्लाल सेन ने वर्ण-धर्म की रक्षा के लिए उस वैवाहिक प्रथा का प्रचार किया जिसे कुलीन प्रथा कहा जाता है। प्रत्येक जाति में उप-विभाजन, उत्पत्ति की विशुद्धता और ज्ञान पर निर्भर करता था। आगे चलकर यह उप-विभाजन बड़ा कठोर और जटिल हो गया। बल्लाल सैन ने अपने पिता के राजस्व-काल में शासन-कार्य का संचालन किया था। वंशक्रमानुगत द्वारा उसे जो राज्य मिला, उसकी उसने पूर्ण रूप से रक्षा की। उसका राज्य पांच प्रान्तों में विभक्त था। उसकी तीन राजधानियाँ थीं- गौड़पुर, विक्रमपुर और सुवर्णग्राम। कहा जाता है कि बल्लाल सेन ने अपने गुरु की सहायता से दानसागर और अद्भुतसागर नामक ग्रन्थों का प्रणयन किया। दूसरा ग्रन्थ वह अपूर्ण ही छोड़कर मर गया। परम माहेश्वर और निश्शकशकर आदि विरुदों से बल्लाल सेन के शैव होने का प्रमाण मिलता है।
  • लक्ष्मण सेन (1179-1205 ई.)- लक्ष्मण सेन अपने वंश का एक प्रसिद्ध शासक था, साथ ही साथ भारत के सबसे कायर नरेशों में भी उसकी गणना की जानी चाहिए। अभिलेखों में उसके लिए कहा गया है कि उसने कलिंग, आसाम, बनारस और इलाहाबाद पर विजय प्राप्त की और इन स्थानों पर उसने अपने विजय-स्तम्भ गाड़े थे। परन्तु अभिलेखों के इस कथन पर पूरी तरह से विश्वास नहीं किया जा सकता। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि लक्ष्मण सेन प्रसिद्ध गहड़वाल नरेश जयचन्द्र का समसामयिक था जिसके अधिकार में बनारस और इलाहाबाद थे। अतएव इन स्थानों पर, लक्ष्मणसेन के द्वारा विजय-स्तम्भ गाड़े जाने की कल्पना बिल्कुल निराधार जान पड़ती है। सम्भव है कि उसने आसाम और कलिंग पर विजय प्राप्त की हो। किन्तु यदि मुस्लिम इतिहासकारों के कथन पर विश्वास किया जाय तो कहना पड़ेगा कि लक्ष्मणसेन नितान्त कायर था।
  • लक्ष्मण सेन का शासन संस्कृत साहित्य के विकास की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। उसकी राजसभा में पाच रत्न रहते थे, जिनके नाम थे- जयदेव (गीतगोविन्द के रचयिता), उमापतिधोयी (पवनदूत के रचयिता), हलायुध और श्रीधरदास। लक्ष्मण सेन ने स्वयं अपने पिता के अपूर्ण ग्रन्थ अद्भुतसागर को पूरा किया। लक्ष्मण सेन के राज्य पर मुसलमानों का आक्रमण 1199 ई. में हुआ था। इसके बाद सेन राजवंश का अन्त हो गया, यद्यपि पूर्वी बंगाल पर उसके बाद तक इस वंश के राजा राज्य करते रहे।
कलचुरी Kalchuri of Tripuri

  • जैजाकभुक्ति के चन्देलों के राज्य के दक्षिण में आ जबलपुर के निकट कलचुरि राजपूतों का राज्य था। अपने को कलचुरि लीग हैह्य वंश का क्षत्रिय बतलाते हैं। गुर्जर प्रतिहारों और बदामी के चालुक्यों के उत्ता ने के पूर्व बुन्देल्क्हंस से लेकर गुजराज और नासिक, तर्क, विशेषकर नर्मदा की उपरली घाटी में, कलचुरी लोग सबसे अधिक शक्तिशाली थे परन्तु हुर्जर-प्रतिहारों और चालुक्यों की शक्ति के उदय से कलचुरियों का प्रभाव दहल (वर्तमान जबलपुर के निकट तक सीमित रह गया। अब कलचुरी राज्य की राजधानी त्रिपुरी हो गई। इसलिए उनको चेदि, दहल अथवा त्रिपुरी के कलचुरि कहा जाने लगा। कलचुरि की एक शाखा गोरखपुर में भी स्थापित हुई थी।
  • कोक्कल-प्रथम (875-925)- कोक्कल-प्रथम कलचुरि वंश का संस्थापक तथा प्रथम ऐतिहासिक शासक था जिसने राष्ट्रकूटों और चन्देलों के साथ विवाह-सम्बन्ध स्थापित किये। प्रतिहारों के साथ कोक्कल-प्रथम का मैत्री-सम्बन्ध था। इस प्रकार उसने अपने समय के शक्तिशाली राज्यों के साथ मित्रता और विवाह द्वारा अपनी शक्ति भी सुदृढ़ की। कोक्कल-प्रथम अपने समय के प्रसिद्ध योद्धाओं और विजेताओं में से एक था। कलचुरि अभिलेखों में कोक्कल को अनेक विजयों का गौरव प्रदान किया गया है, परन्तु जैसा कि पीछे कहा जा चुका हम इस युग के अभिलेखों में उल्लिखित सभी बातों को ऐतिहासिक सत्य रूप में स्वीकार नहीं कर सकते। अतएव कलचुरि अभिलेखों के आधार पर कोक्कल को अपने समय का सबसे महान् विजेता नहीं कहा जा सकता। फिर भी इस बात में सन्देह नहीं कि कोक्कल पराक्रमी एवं साहसी विजेता था और उसने अपनी विजयों द्वारा एक स्वतन्त्र राज्य की स्थापना की।
  • एक अभिलेख से पता चलता है कि कोक्कल-प्रथम ने अपने राष्ट्रकूट जामाता को वेंगी के विनयादित्य-तृतीय (पूर्व चालुक्यराज) के विरुद्ध आश्रय तथा सहायता प्रदान की। एक अन्य अभिलेख से यह ध्वनित होता है कि कोक्कल ने भोज-प्रथम को सुरक्षा प्रदान कर, प्रतिहार नरेश महीपाल से शत्रुता कर ली, परन्तु भोज-प्रथम उसका मित्र हो गया। कोक्कल को अभिलेखों में सारी पृथ्वी का विजेता तथा अपने समकालीन नरेशों का कोषहर्ता कहा गया है जो स्पष्टतया प्रशस्तिमात्र है। अपने शासन-काल के अन्तिम समय में कोक्कल ने उत्तरी कोंकण पर आक्रमण किया और पूर्वी चालुक्यों तथा प्रतिहारों के विरुद्ध राष्ट्रकूट नरेश कृष्ण-द्वितीय को सहायता प्रदान की। कोक्कल ने अपनी विजयों के द्वारा जिस राज्य की स्थापना की, उसमें उसकी मृत्यु के शीघ्र बाद ही विघटन के तत्व उत्पन्न हो गये जिससे कलचुरियों की शक्ति क्षीण होने लगी। परन्तु ग्यारहवीं शताब्दी में गांगेयदेव की अधीनता में कलचुरियों को भारत की सबसे महान् राजनैतिक शक्ति होने का गौरव प्राप्त हो गया।
  • कोक्कल प्रथम के बाद उसका ज्येष्ठ पुत्र शंकरगण सिंहासन पर बैठा। शंकरगण के उपरान्त क्रमश: युवराज प्रथम, लक्ष्मणराज, युवराज द्वितीय तथा कोक्कल द्वितीय कलचुरि राज्य के शासक हुए। कोक्कल द्वितीय को गुजरात के चालुक्य नरेश चामुण्डिराज को पराजित करने का श्रेय है। उसने कुन्तल नरेश सत्याश्रय और गौड नरेश महिपाल को पराजित किया। कोक्कल द्वितीय के बाद गांगेयदेव कलचुरि राज्य का राज्याधिपति बना।
  • गांगेयदेव- गांगेयदेव लगभग 1019 ई. में त्रिपुरी के राजसिंहासन पर बैठा। गांगेयदेव को अपने सैन्य-प्रयत्नों में विफलता भी प्राप्त हुई किन्तु उसने कई विजयें प्राप्त की और अपने राज्य का विस्तार करने में काफी अंश तक सफलता प्राप्त की। उसके अभिलेखों के अतिरंजनापूर्ण विवरणों को न स्वीकार करने पर भी, यह माना गया है कि गांगेयदेव ने कीर देश अथवा कांगड़ा घाटी तक उत्तर भारत में आक्रमण किये और पूर्व में बनारस तथा प्रयाग तक अपने राज्य की सीमा को बढ़ाया। प्रयाग और वाराणसी से और आगे वह पूर्व में बढ़ा। अपनी सेना लेकर वह सफलतापूर्वक पूर्वी समुद्र तट तक पहुँच गया और उड़ीसा को विजित किया। अपनी इन विजयों के कारण उसने विक्रमादित्य का विरुद धारण किया। उसने पालों के बल की अवहेलना करते हुए अंग पर आक्रमण किया। इस आक्रमण में उसे सफलता प्राप्त हुई। यह सम्भव है कि गांगेयदेव ने कुछ समय तक मिथिला या उत्तरी बिहार पर भी अपना अधिकार जमाये रखा था।
  • डॉ. मजूमदार का कहना है कि गांगेयदेव ने मुसलमानों की शक्ति से लोहा लिया। उसकी यह गर्वोक्ति कि उसने कीर प्रदेश तक धावा बोला था, यह ध्वनित करता है कि उसने मुसलमानों की शक्ति को चुनौती दी क्योंकि कीर प्रदेश मुसलमानों के अधीनस्थ पंजाब का एक भाग था। गांगेयदेव की मृत्यु प्रयाग में हुई थी। उसकी मृत्यु के बाद उसकी पत्नियाँ उसके साथ चिता में जल कर भस्म हो गई। गांगेयदेव का शासन-काल पूर्ण रूप से निश्चित नहीं किया जा सकता। परन्तु यह अनुमान किया जाता है कि 1019 ई. में वह सिंहासन पर बैठा और 1040 ई. में उसकी मृत्यु हुई।
  • गांगेयदेव ही अपने वंश में ऐसा सम्राट् था जिसने अपने नाम के सिक्के चलवाये। उसके सिक्कों पर उसके नाम के साथ-साथ लक्ष्मी की आकृति भी खुदी हुई है। गांगेयदेव के सिक्के सोने, चाँदी और ताँबे, तीनों प्रकार के थे। वह शिवोपासक था और उसने शिवजी का एक भव्य मन्दिर बनवाया था।
  • लक्ष्मीकर्ण- गांगेयदेव के उपरान्त उसका प्रतापी पुत्र लक्ष्मीकर्ण अथवा कर्णराज सिंहासन पर बैठा। वह अपने पिता की भांति एक वीर सैनिक और सहस्रों युद्धों का विजेता था। उसने काफी विस्तृत और महत्त्वपूर्ण विजयों द्वारा कलचुरि शक्ति का विकास किया। कल्याणी और अन्हिलवाड के शासकों से सहायता प्राप्त कर कर्ण ने परमार राजा भोज को परास्त कर दिया। उसने चन्देलों और पालों पर विजय प्राप्त की। उसके अभिलेख बंगाल और उत्तर प्रदेश में पाये गये हैं, जिनसे यह सिद्ध होता है कि इन भागों पर उसका अधिकार था। कर्ण का राज्य गुजरात से लेकर बंगाल और गंगा से महानदी तक फैला हुआ था। उसने कलिंगापति की उपाधि ली।
  • कर्ण की विजयों के कारण उसे भारतीय इतिहास के सबसे महान् विजेताओं में एक कहा गया है। प्रसिद्ध विजेता नैपोलियन के साथ उसकी तुलना की गई है। परन्तु यह न भूलना चाहिए कि अपने जीवन के अन्तिम दिनों में कर्ण को कई पराजयें सहनी पड़ी थीं। पालों, चन्देलों, परमारों और सोलंकियों, सभी ने उसको हराया। अतएव कर्ण की प्रारम्भिक विजयों का कोई स्थायी प्रभाव नहीं पड़ सका। उसकी विजयों ने उसके गौरव को तो बढ़ाया किन्तु उसकी राज्य-सीमा में कोई विस्तार नहीं किया। 1072 ई. में कर्ण ने अपने पुत्र के लिए सिंहासन त्याग दिया।
  • यशकर्ण- यश कर्ण सन सन 1703 के लगभग त्रिपुरी के सिंहासन पर बैठा। उसने वेंगी राज्य और उत्तरी बिहार तक धावे बोले। उसके पिता के अंतिम दिनों में उसके राज्य की स्थिति काफी डावांडोल हो गयी थी और इसी डावांडोल स्थिति में उसने राज्सिनासन पर पैर धारा था। परन्तु अपने राज्य की इस गड़बड़ स्थिति का विचार न करते हुए यशकर्ण ने अपने पिता और पितामह की भांति सैन्य-विजय क्रम जारी रखा। पहले तो उसे कुछ सफलता मिली, लेकिन शीघ्र ही उसका राज्य स्वयं अनेक आक्रमणों का केंद्र बिंदु बन गया। उसके पिता और पितामह की आक्रमणात्मक साम्राज्यवादी नीति से जिन राज्यों को क्षति पहुंची थी, वे सब प्रतिकार लेने का विचार करने लगे। दक्कन के चालुक्यों ने उसके राज्य पर हमला बोल दिया और अपने हमले में वे सफल भी रहे। गहड़वालों के उदय ने गंगा के मैदान में उसकी स्थिति पर विपरीत प्रभाव डाला। चंदेलों ने भी उसकी शक्ति को सफलतापूर्वक खुली चुनौती डी। परमारों ने यश कर्ण की राजधानी को खूब लूटा-खसोटा। इन सब पराजयों ने उसकी शक्ति को झकझोर दिया। उसके हाथों से प्रयाग और वाराणसी के नगर निकल गए और उसके वंश का गौरव श्रीहत हो गया।
  • यशःकर्ण के उत्तराधिकारी और कलचुरी वंश का पतन- यशः कर्ण के उपरांत उसका पुत्र गया कर्ण सिंहासनारूढ़ हुआ किन्तु वह अपने पिता के शासन काल में प्रारंभ होने वाली अपने वंश की राजनैतिक अवनति को वह रोक न सका। उसके शासन-काल में रत्नपुरी की कलचुरि शाखा दक्षिण कौशल में स्वतन्त्र हो गई। गयाकर्ण ने मालवा-नरेश उदयादित्य की पौत्री से विवाह किया था। इसका नाम अल्हनादेवी था। गयाकर्ण की मृत्यु के बाद, अल्हनादेवी ने भेरघाट में वैद्यनाथ के मन्दिर और मठ का पुनर्निर्माण कराया। गयाकर्ण का अद्वितीय पुत्र जयसिंह कुछ प्रतापी था। उसने कुछ अंश तक अपने वंश के गौरव को पुनः प्रतिष्ठापित करने में सफलता प्राप्त की। उसने सोलंकी नरेश कुमारपाल को पराजित किया। जयसिंह की मृत्यु 1175 और 1180 के मध्य किसी समय हुई। उसका पुत्र विजयसिंह कोक्कल-प्रथम के वंश का अन्तिम नरेश था जिसने त्रिपुरी पर राज्य किया। विजयसिंह को 1196 और 1200 के बीच में जैतुगि-प्रथम ने, जो देवगिरि के यादववंश का नरेश था, मार डाला और त्रिपुरी के कलचुरि वंश का उन्मूलन कर दिया।

अन्हिलवाड के सोलंकी Solanki Of Anhilvad


  • गुजरात में अन्हिलवाड (पाटन) नामक स्थान पर पहले प्रतिहार साम्राज्य का अधिकार था, परन्तु राजनैतिक प्रभुता के लिए राष्ट्रकूटों और प्रतिहारों में जो पारस्परिक संघर्ष हुआ उससे लाभ उठाकर मूलराज-प्रथम ने दसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में (942 ई.) अपना एक स्वतन्त्र राज्य स्थापित कर लिया और अन्हिलवाड को अपने राज्य की राजधानी बनाया।
  • मूलराज सोलंकी- मूलराज सोलंकी ने अपने एक स्वतंत्र राज्य की स्थापना कर लेने के बाद इसकी सीमाओं के विस्तार का भी प्रयत्न किया। उसने शीघ्र ही कच्छ देश और सुराष्ट्र के पूर्वी भाग पर अपना अधिकार जमा लिया। परन्तु उसे अपने प्रबल पड़ोसियों की शक्ति का भी सामना करना पड़ा। उसने कई आक्रमणों का सामना किया और अधिकतर में उसे पराजय ही प्राप्त हुई फिर भी उसने अपने राजकुल का, जिसका कि वह स्वयं प्रतिष्ठापक था, नाश नहीं होने दिया। उसकी मृत्यु के समय सोलंकियों का राज्य पूर्व और दक्षिण में साबरमती तक फैला हुआ था। जोधपुर राज्य का संचार भी उत्तर में इसमें सम्मिलित था। मूलराज की मृत्यु रणस्थल में विग्रहराज-द्वितीय के हाथों से हुई। मूलराज के पुत्र चामुण्डराज ने धारा नगरी के परमार नरेश सिन्धुराज को पराजित किया। चामुण्डराज का पौत्र भीमदेव-प्रथम (1022) सोलंकी राजकुल का एक विख्यात नरेश था।
  • भीमदेव-प्रथम- भीमदेव-प्रथम के शासन-काल के प्रारम्भिक वर्षों में महमूद ने उसके राज्य पर आक्रमण किया था। भीम ने उसके आक्रमण का मुकाबला करने का निश्चय किया। परन्तु एकाएक उसके ऊपर मुस्लिम आक्रमणकारी का आतंक छा गया और वह रणभूमि छोड़कर भाग गया। महमूद ने सोमनाथ के मन्दिर को खूब लूटा-खसोटा और वह अतुल सम्पत्ति लादकर अपने देश ले गया। महमूद द्वारा भगवान सोमनाथ के मन्दिर के तुड़वा दिये जाने पर भीमदेव ने उसका पुनर्निर्माण कराया। महमूद के लौट जाने पर भीमदेव ने फिर से अपनी शक्ति का संगठन किया। पहले उसने आबू के परमार राजा को हराया। भीम ने परमार-नरेश के पतन में अपना योगदान दिया। इस कार्य में भीम ने लक्ष्मीकर्ण कलचुरि से सहायता प्राप्त की थी परन्तु उन दोनों की मैत्री अधिक समय तक टिक न सकी। दोनों में परस्पर लड़ाई छिड़ गई जिसमें लक्ष्मीकर्ण की हार हो गई। माना जाता है कि भीम प्रथम ने भीमेश्वर देव तथा मट्टारिका के मंदिरों का निर्माण करवाया। उसके सेनानायक विमल ने माउंट आबू पर एक प्रसिद्ध जैन मंदिर का निर्माण करवाया। यह विमल वसही के नाम से जाना जाता है। भीमदेव के उपरान्त कर्णदेव हलवाड के राजसिंहासन पर समासीन हुआ। कर्ण ने 1064 से लेकर 1094 तक शासन किया। कर्ण का शासन-काल शान्तिपूर्ण कार्यों के लिए विख्यात है। उसने अनेक मन्दिरों (कर्णेश्वर मंदिर) का निर्माण कराया, उसके समय में उसके ही नाम से एक नगर की स्थापना की गई। उसने कवि विल्हण को राजाश्रय प्रदान किया। कर्ण को परमार राजा उदयादित्य ने युद्ध में पराजित किया। कर्ण ने कर्ण सागर झील का भी निर्माण करवाया था।
  • जयसिंह सिद्धराज- कर्ण का पुत्र जयसिंह सिद्धराज अपने वंश का प्रतापी और विख्यात राजा था। अपनी रणवाहिनी को उसने चारों दिशाओं में घुमाया और लगभग सर्वत्र विजय पायी। अपनी विजयों से उसने अपने पड़ोसियों को आतंकित कर दिया। उसने सुराष्ट्र के आभीर सरदार को युद्ध में पराजित करके उस राज्य को अपने साम्राज्य में मिला लिया। जयसिंह ने बारह वर्षों तक मालवा से युद्ध किया और नरवर्मन तथा यशोवर्मन दोनों को सिंहासन-च्युत् करके उनके राज्य पर अधिकार कर लिया। नद्दुल और शाकम्भरी दोनों स्थानों के चाहमान नरेशों ने उसके आगे आत्म-समर्पण कर दिया और उसके सामन्त के रूप में अपने राज्यों का शासन करते रहे। जयसिंह ने यशकर्ण कलचुरि और गोविन्दचन्द्र गहड़वाल से मैत्री-सम्बन्ध स्थापित किया। उसने चन्देल राज्य पर भी आक्रमण किया और कालिंजर तथा महोबा तक आगे बढ़ गया। चन्देल नरेश मदनवर्मन को बाध्य होकर जयसिंह के साथ सन्धि करनी पड़ी और इस सन्धि के फलस्वरूप उसने सोलंकी राज्य को भिलसा का प्रदेश दिया। जयसिंह ने चालुक्य नृपति विक्रमादित्य-षष्ठ पर भी विजय प्राप्त की। कहा जाता है कि सिन्ध के अरबों के विरुद्ध युद्ध में भी जयसिंह को सफलता प्राप्त हुई थी। उसके अभिलेखों के प्राप्ति-स्थानों से विदित होता है कि गुजरात, काठियावाड, कच्छ, मालवा और दक्षिणी राजपूताना उसके राज्य में सम्मिलित थे। जयसिंह ने 1113-14 ई. में एक नया सम्वत् चलाया।
  • राजा भोज की भांति यद्यपि सोलंकी नरेश जयसिंह का भी समय अधिकतर युद्ध में व्यतीत हुआ तथापि भोज की ही तरह उसने भी विद्या को प्रश्रय प्रदान किया। ज्योतिष, न्याय और पुराण के अध्ययन के लिए जयसिंह ने शिक्षण संस्थायें खुलवाई। उसकी राजसभा में प्रसिद्ध जैन लेखक महापण्डित हेमचन्द्र रहते थे जिनके अनेक ग्रन्थ, उनके मस्तिष्क और विचार-शक्ति की उर्वरता को व्यक्त करते हैं। जयसिंह स्वयं कट्टर शैव था, परन्तु उसका धार्मिक दृष्टिकोण राजा भोज की भांति जिज्ञासा-प्रधान था। जयसिंह विभिन्न धमाँ के आचायों के बीच धार्मिक विषयों पर विचार-विमर्श के लिए सम्मेलनों का आयोजन करता था। अकबर की धार्मिक विचारधारा का यह पुर्वाभास था। जयसिंह ने अपने राज्य में अनेक मन्दिरों का निर्माण कराया। स्वयं शैव होते हुए भी उसने जैन पण्डित हेमचन्द्र को अपनी राजसभा में स्थान दिया। जयसिंह ने अवन्तिनाथ और सिद्धराज विरुद धारण किये। उसने सिद्धपुर में रूद्रमहाकाल मंदिर बनवाया। लगभग 1143 ई. में जयसिंह का देहान्त हो गया।
  • कुमारपाल- जयसिंह के उपरान्त उसके दूर के एक सम्बन्धी कुमारपाल ने उसके राज्य पर अधिकार कर लिया, क्योंकि जयसिंह के कोई पुत्र नहीं था। शाकम्भरी के चाहमानों को कुमारपाल ने पराजित किया और आबू के परमारों को दबाया। कोंकण के राजा मल्लिकार्जुन को भी उसने हराया था। कुमारपाल का नाम जैन धर्म के इतिहास में काफी प्रसिद्ध है जैन ग्रन्थों में लिखा है कि आचार्य हेमचन्द्र के सशक्त धर्म-निरूपण से प्रभावित होकर कुमारपाल ने जैन मत ग्रहण कर लिया। उसने अपने राज्य भर में अहिंसा के सिद्धान्तों के परिपालन के लिए कठोर आज्ञायें निकलवा दीं। उसने ब्राह्मणों को इस बात के लिए बाध्य किया कि वे पशुबलि-प्रधान यज्ञों का परित्याग कर दें। राज्य भर में कुमारपाल ने कसाइयों की दुकानों पर ताला लगवा दिया। संन्यासियों को मृगचर्म मिलना बन्द हो गया क्योंकि पशुओं का आखेट करना राजकीय कानून की दृष्टि से अवैध ठहरा दिया गया था। गिरनार पर्वत के निकट शिकारियों के समुदाय भूखों मरने लगे। राज्य भर में मनोरंजन के लिए पशुओं की लड़ाइयों को निषिद्ध ठहरा दिया गया। जुआ और सुरा-सेवन पर कठोर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। जैन ग्रन्थों में कुमारपाल के अहिंसापालन-सम्बन्धी आदेशों के विषय में अनेक कथाएं प्रचलित हैं। फिर भी उसके जैन मतानुयायी होने में संदेह का कोई कारण नहीं दिखलाई पड़ता। जैन धर्म का अनुयायी होने पर भी कुमारपाल ने अपने पूर्वजों की शिवोपासना-सम्बन्धी मनोवृत्ति का त्याग नहीं किया। उसने सोमनाथ के प्रसिद्ध मन्दिर का जीर्णोद्धार कराया। उत्कीर्ण लेखों में कुमारपाल को शैव कहा गया है। 1171 ई. में कुमारपाल का देहान्त हो गया।
  • भीमवेव द्वितीय- कुमारपाल के बाद अजयपाल गुजरात का शासक हुआ जिसने अपने राज्य में जैन मत के विरुद्ध एक प्रतिक्रियात्मक नीति का प्रचार किया। उसने जैन मन्दिर को विध्वस्त कराना शुरू किया। कहा जाता है कि उसने महापण्डित हेमचन्द्र के प्रिय शिष्य और प्रसिद्ध जैन लेखक रामचन्द्र का वध करा दिया था। किन्तु उसकी इस धार्मिक असहिष्णुता और संकीर्णता का प्रभाव अच्छा नहीं पड़ा। 1176 ई. में प्रतिहार नरेश वयजलदेव ने अजयपाल की हत्या कर दी। अजयपाल के पश्चात् मूलराज-द्वितीय ने कुछ समय तक शासन किया। उसके बाद 1178 ई. में भीमदेव-द्वितीय राजा हुआ जिसने राज्यारोहण के वर्ष ही गोर के मुहम्मद को युद्ध में हराया। सन् 1195 में भीमदेव-द्वितीय ने कुतुबुद्दीन ऐबक से युद्ध किया और उसे इतनी गहरी पराजय दी कि मुस्लिम सेनानायक को अजमेर तक पीछे ढकेल दिया। परन्तु दूसरे वर्ष (1197 ई.) में अन्हिलवाड़ा पर मुसलमानों का अधिकार हो गया। किन्तु कुतुबुद्दीन का गुजरात पर स्थायी रूप से अधिकार नहीं स्थापित हो सका।
  • भीमदेव-द्वितीय ने एक लम्बे समय, लगभग साठ वर्षों तक शासन किया। मुसलमानों के जो आक्रमण उसके समय में हुए उससे उसके राज्य की स्थिति काफी डावांडोल हो गई और प्रान्तीय शासकों ने अपनी स्वतन्त्रता घोषित करने का अवसर ताकना आरम्भ किया। अन्हिलवाड़ के राज्य की स्थिति इस समय इतनी गिरी हुई थी कि इसका शीघ्र विनष्ट हो जाना अवश्यवम्भावी प्रतीत हो। रहा था। राज्य के बड़े-बड़े अधिकारियों और कुछ मन्त्रियों की नीयत भी दूषित हो गई। परन्तु अर्णोराज नामक एक बघेल ने राज्य को पूर्ण विनाश से बचा लिया। उसके सुयोग्य पुत्र लवण प्रसाद ने अपने पिता के नाम को जारी रखा और शासन-संचालन का सारा कार्य अपने ही कन्धों पर वहन किया। उसने आन्तरिक विद्रोहों से राज्य की रक्षा की और बाहरी आक्रमणों का सफलतापूर्वक सामना किया। इस प्रकार अन्हिलवाड का राज्य अपनी स्वतन्त्रता की रक्षा करता हुआ अलाउद्दीन खिलजी के पूर्व तक बना रहा। तेरहवीं शताब्दी के अन्त में इस महत्त्वाकांक्षी मुस्लिम शासक ने अपने दो सेनापतियों उलुग खां और नुसरत खां
  • की अध्यक्षता में एक विशाल सेना भेजी जिसे देखकर कर्ण, जो इस समय का शासक था, भाग गया। गुजरात के राज्य पर मुसलमानों का अधिकार हो गया। जैन आचार्य मेरुतुंग के ग्रन्थ प्रबोधचिन्तामणि से गुजरात के प्राचीन इतिहास के विषय में काफी महत्त्वपूर्ण सूचनायें प्राप्त होती हैं।

  • अन्हिलवाड के सोलंकी Solanki Of Anhilvad

  • गुजरात में अन्हिलवाड (पाटन) नामक स्थान पर पहले प्रतिहार साम्राज्य का अधिकार था, परन्तु राजनैतिक प्रभुता के लिए राष्ट्रकूटों और प्रतिहारों में जो पारस्परिक संघर्ष हुआ उससे लाभ उठाकर मूलराज-प्रथम ने दसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में (942 ई.) अपना एक स्वतन्त्र राज्य स्थापित कर लिया और अन्हिलवाड को अपने राज्य की राजधानी बनाया।
  • मूलराज सोलंकी- मूलराज सोलंकी ने अपने एक स्वतंत्र राज्य की स्थापना कर लेने के बाद इसकी सीमाओं के विस्तार का भी प्रयत्न किया। उसने शीघ्र ही कच्छ देश और सुराष्ट्र के पूर्वी भाग पर अपना अधिकार जमा लिया। परन्तु उसे अपने प्रबल पड़ोसियों की शक्ति का भी सामना करना पड़ा। उसने कई आक्रमणों का सामना किया और अधिकतर में उसे पराजय ही प्राप्त हुई फिर भी उसने अपने राजकुल का, जिसका कि वह स्वयं प्रतिष्ठापक था, नाश नहीं होने दिया। उसकी मृत्यु के समय सोलंकियों का राज्य पूर्व और दक्षिण में साबरमती तक फैला हुआ था। जोधपुर राज्य का संचार भी उत्तर में इसमें सम्मिलित था। मूलराज की मृत्यु रणस्थल में विग्रहराज-द्वितीय के हाथों से हुई। मूलराज के पुत्र चामुण्डराज ने धारा नगरी के परमार नरेश सिन्धुराज को पराजित किया। चामुण्डराज का पौत्र भीमदेव-प्रथम (1022) सोलंकी राजकुल का एक विख्यात नरेश था।
  • भीमदेव-प्रथम- भीमदेव-प्रथम के शासन-काल के प्रारम्भिक वर्षों में महमूद ने उसके राज्य पर आक्रमण किया था। भीम ने उसके आक्रमण का मुकाबला करने का निश्चय किया। परन्तु एकाएक उसके ऊपर मुस्लिम आक्रमणकारी का आतंक छा गया और वह रणभूमि छोड़कर भाग गया। महमूद ने सोमनाथ के मन्दिर को खूब लूटा-खसोटा और वह अतुल सम्पत्ति लादकर अपने देश ले गया। महमूद द्वारा भगवान सोमनाथ के मन्दिर के तुड़वा दिये जाने पर भीमदेव ने उसका पुनर्निर्माण कराया। महमूद के लौट जाने पर भीमदेव ने फिर से अपनी शक्ति का संगठन किया। पहले उसने आबू के परमार राजा को हराया। भीम ने परमार-नरेश के पतन में अपना योगदान दिया। इस कार्य में भीम ने लक्ष्मीकर्ण कलचुरि से सहायता प्राप्त की थी परन्तु उन दोनों की मैत्री अधिक समय तक टिक न सकी। दोनों में परस्पर लड़ाई छिड़ गई जिसमें लक्ष्मीकर्ण की हार हो गई। माना जाता है कि भीम प्रथम ने भीमेश्वर देव तथा मट्टारिका के मंदिरों का निर्माण करवाया। उसके सेनानायक विमल ने माउंट आबू पर एक प्रसिद्ध जैन मंदिर का निर्माण करवाया। यह विमल वसही के नाम से जाना जाता है। भीमदेव के उपरान्त कर्णदेव हलवाड के राजसिंहासन पर समासीन हुआ। कर्ण ने 1064 से लेकर 1094 तक शासन किया। कर्ण का शासन-काल शान्तिपूर्ण कार्यों के लिए विख्यात है। उसने अनेक मन्दिरों (कर्णेश्वर मंदिर) का निर्माण कराया, उसके समय में उसके ही नाम से एक नगर की स्थापना की गई। उसने कवि विल्हण को राजाश्रय प्रदान किया। कर्ण को परमार राजा उदयादित्य ने युद्ध में पराजित किया। कर्ण ने कर्ण सागर झील का भी निर्माण करवाया था।
  • जयसिंह सिद्धराज- कर्ण का पुत्र जयसिंह सिद्धराज अपने वंश का प्रतापी और विख्यात राजा था। अपनी रणवाहिनी को उसने चारों दिशाओं में घुमाया और लगभग सर्वत्र विजय पायी। अपनी विजयों से उसने अपने पड़ोसियों को आतंकित कर दिया। उसने सुराष्ट्र के आभीर सरदार को युद्ध में पराजित करके उस राज्य को अपने साम्राज्य में मिला लिया। जयसिंह ने बारह वर्षों तक मालवा से युद्ध किया और नरवर्मन तथा यशोवर्मन दोनों को सिंहासन-च्युत् करके उनके राज्य पर अधिकार कर लिया। नद्दुल और शाकम्भरी दोनों स्थानों के चाहमान नरेशों ने उसके आगे आत्म-समर्पण कर दिया और उसके सामन्त के रूप में अपने राज्यों का शासन करते रहे। जयसिंह ने यशकर्ण कलचुरि और गोविन्दचन्द्र गहड़वाल से मैत्री-सम्बन्ध स्थापित किया। उसने चन्देल राज्य पर भी आक्रमण किया और कालिंजर तथा महोबा तक आगे बढ़ गया। चन्देल नरेश मदनवर्मन को बाध्य होकर जयसिंह के साथ सन्धि करनी पड़ी और इस सन्धि के फलस्वरूप उसने सोलंकी राज्य को भिलसा का प्रदेश दिया। जयसिंह ने चालुक्य नृपति विक्रमादित्य-षष्ठ पर भी विजय प्राप्त की। कहा जाता है कि सिन्ध के अरबों के विरुद्ध युद्ध में भी जयसिंह को सफलता प्राप्त हुई थी। उसके अभिलेखों के प्राप्ति-स्थानों से विदित होता है कि गुजरात, काठियावाड, कच्छ, मालवा और दक्षिणी राजपूताना उसके राज्य में सम्मिलित थे। जयसिंह ने 1113-14 ई. में एक नया सम्वत् चलाया।
  • राजा भोज की भांति यद्यपि सोलंकी नरेश जयसिंह का भी समय अधिकतर युद्ध में व्यतीत हुआ तथापि भोज की ही तरह उसने भी विद्या को प्रश्रय प्रदान किया। ज्योतिष, न्याय और पुराण के अध्ययन के लिए जयसिंह ने शिक्षण संस्थायें खुलवाई। उसकी राजसभा में प्रसिद्ध जैन लेखक महापण्डित हेमचन्द्र रहते थे जिनके अनेक ग्रन्थ, उनके मस्तिष्क और विचार-शक्ति की उर्वरता को व्यक्त करते हैं। जयसिंह स्वयं कट्टर शैव था, परन्तु उसका धार्मिक दृष्टिकोण राजा भोज की भांति जिज्ञासा-प्रधान था। जयसिंह विभिन्न धमाँ के आचायों के बीच धार्मिक विषयों पर विचार-विमर्श के लिए सम्मेलनों का आयोजन करता था। अकबर की धार्मिक विचारधारा का यह पुर्वाभास था। जयसिंह ने अपने राज्य में अनेक मन्दिरों का निर्माण कराया। स्वयं शैव होते हुए भी उसने जैन पण्डित हेमचन्द्र को अपनी राजसभा में स्थान दिया। जयसिंह ने अवन्तिनाथ और सिद्धराज विरुद धारण किये। उसने सिद्धपुर में रूद्रमहाकाल मंदिर बनवाया। लगभग 1143 ई. में जयसिंह का देहान्त हो गया।
  • कुमारपाल- जयसिंह के उपरान्त उसके दूर के एक सम्बन्धी कुमारपाल ने उसके राज्य पर अधिकार कर लिया, क्योंकि जयसिंह के कोई पुत्र नहीं था। शाकम्भरी के चाहमानों को कुमारपाल ने पराजित किया और आबू के परमारों को दबाया। कोंकण के राजा मल्लिकार्जुन को भी उसने हराया था। कुमारपाल का नाम जैन धर्म के इतिहास में काफी प्रसिद्ध है जैन ग्रन्थों में लिखा है कि आचार्य हेमचन्द्र के सशक्त धर्म-निरूपण से प्रभावित होकर कुमारपाल ने जैन मत ग्रहण कर लिया। उसने अपने राज्य भर में अहिंसा के सिद्धान्तों के परिपालन के लिए कठोर आज्ञायें निकलवा दीं। उसने ब्राह्मणों को इस बात के लिए बाध्य किया कि वे पशुबलि-प्रधान यज्ञों का परित्याग कर दें। राज्य भर में कुमारपाल ने कसाइयों की दुकानों पर ताला लगवा दिया। संन्यासियों को मृगचर्म मिलना बन्द हो गया क्योंकि पशुओं का आखेट करना राजकीय कानून की दृष्टि से अवैध ठहरा दिया गया था। गिरनार पर्वत के निकट शिकारियों के समुदाय भूखों मरने लगे। राज्य भर में मनोरंजन के लिए पशुओं की लड़ाइयों को निषिद्ध ठहरा दिया गया। जुआ और सुरा-सेवन पर कठोर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। जैन ग्रन्थों में कुमारपाल के अहिंसापालन-सम्बन्धी आदेशों के विषय में अनेक कथाएं प्रचलित हैं। फिर भी उसके जैन मतानुयायी होने में संदेह का कोई कारण नहीं दिखलाई पड़ता। जैन धर्म का अनुयायी होने पर भी कुमारपाल ने अपने पूर्वजों की शिवोपासना-सम्बन्धी मनोवृत्ति का त्याग नहीं किया। उसने सोमनाथ के प्रसिद्ध मन्दिर का जीर्णोद्धार कराया। उत्कीर्ण लेखों में कुमारपाल को शैव कहा गया है। 1171 ई. में कुमारपाल का देहान्त हो गया।
  • भीमवेव द्वितीय- कुमारपाल के बाद अजयपाल गुजरात का शासक हुआ जिसने अपने राज्य में जैन मत के विरुद्ध एक प्रतिक्रियात्मक नीति का प्रचार किया। उसने जैन मन्दिर को विध्वस्त कराना शुरू किया। कहा जाता है कि उसने महापण्डित हेमचन्द्र के प्रिय शिष्य और प्रसिद्ध जैन लेखक रामचन्द्र का वध करा दिया था। किन्तु उसकी इस धार्मिक असहिष्णुता और संकीर्णता का प्रभाव अच्छा नहीं पड़ा। 1176 ई. में प्रतिहार नरेश वयजलदेव ने अजयपाल की हत्या कर दी। अजयपाल के पश्चात् मूलराज-द्वितीय ने कुछ समय तक शासन किया। उसके बाद 1178 ई. में भीमदेव-द्वितीय राजा हुआ जिसने राज्यारोहण के वर्ष ही गोर के मुहम्मद को युद्ध में हराया। सन् 1195 में भीमदेव-द्वितीय ने कुतुबुद्दीन ऐबक से युद्ध किया और उसे इतनी गहरी पराजय दी कि मुस्लिम सेनानायक को अजमेर तक पीछे ढकेल दिया। परन्तु दूसरे वर्ष (1197 ई.) में अन्हिलवाड़ा पर मुसलमानों का अधिकार हो गया। किन्तु कुतुबुद्दीन का गुजरात पर स्थायी रूप से अधिकार नहीं स्थापित हो सका।
  • भीमदेव-द्वितीय ने एक लम्बे समय, लगभग साठ वर्षों तक शासन किया। मुसलमानों के जो आक्रमण उसके समय में हुए उससे उसके राज्य की स्थिति काफी डावांडोल हो गई और प्रान्तीय शासकों ने अपनी स्वतन्त्रता घोषित करने का अवसर ताकना आरम्भ किया। अन्हिलवाड़ के राज्य की स्थिति इस समय इतनी गिरी हुई थी कि इसका शीघ्र विनष्ट हो जाना अवश्यवम्भावी प्रतीत हो। रहा था। राज्य के बड़े-बड़े अधिकारियों और कुछ मन्त्रियों की नीयत भी दूषित हो गई। परन्तु अर्णोराज नामक एक बघेल ने राज्य को पूर्ण विनाश से बचा लिया। उसके सुयोग्य पुत्र लवण प्रसाद ने अपने पिता के नाम को जारी रखा और शासन-संचालन का सारा कार्य अपने ही कन्धों पर वहन किया। उसने आन्तरिक विद्रोहों से राज्य की रक्षा की और बाहरी आक्रमणों का सफलतापूर्वक सामना किया। इस प्रकार अन्हिलवाड का राज्य अपनी स्वतन्त्रता की रक्षा करता हुआ अलाउद्दीन खिलजी के पूर्व तक बना रहा। तेरहवीं शताब्दी के अन्त में इस महत्त्वाकांक्षी मुस्लिम शासक ने अपने दो सेनापतियों उलुग खां और नुसरत खां
  • की अध्यक्षता में एक विशाल सेना भेजी जिसे देखकर कर्ण, जो इस समय का शासक था, भाग गया। गुजरात के राज्य पर मुसलमानों का अधिकार हो गया। जैन आचार्य मेरुतुंग के ग्रन्थ प्रबोधचिन्तामणि से गुजरात के प्राचीन इतिहास के विषय में काफी महत्त्वपूर्ण सूचनायें प्राप्त होती हैं।

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