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मध्य प्रदेश के मेले , पर्व और उत्सव { Fair and Festivals of Madhya Pradesh}

मध्य प्रदेश के पर्व और उत्सव

पर्व और उत्सव
सभ्यता और संस्कृति के विकास में पर्व या उत्सवों का महत्व पूर्ण स्थान है। मध्यप्रदेश में पूरे वर्ष विभिन्न सामाजिक और धार्मिक उत्सव आयोजित किए जाते हैं। कुछ प्रमुख उत्सव निम्नलिखित हैं।
गणगौर
शिव और पार्वती की पूजा वाला यह पर्व वर्ष में दो बार मनाया जाता है। छत्तीसगढ़ में इसे गौर कहते हैं और कार्तिक में मनाते हैं । यह महिलाओं का पर्व है। मालवा में इसे दो बार मनाया जाता है। चैत (मार्च-अप्रैल) तथा भादो माह में स्त्रियां शिव-पार्वती की प्रतिमाएं बनाती हैं तथा पूजा करती हैं, पूजा के दौरान महिलाएं नृत्य करती हैं। बताशे बांटती हैं और प्रतिमाओं को जलाशय या नदी में विसर्जित करती हैं। विभिन्न भागों में इस पर्व से संबंधित अनेक जनश्रुतियाँ हैं।
भाईदूज
साल में दो बार मनाई जाती है। एक चैत माह में होली के उपरांत तथा दूसरी कार्तिक में दीपावली के बाद। यह रक्षाबंधन की तरह ही है। बहनें भाई को कुमकुम, हल्दी, चावल से तिलक करती हैं तथा भाई, बहिनों को उनकी रक्षा करने का वचन देते हैं। इस पर्व से संबंधित एक प्रचलित कथा इस प्रकार है। यमुना (नदी), यमराज (मृत्यु के देवता), की बहन थी एक बार यमराज भाईदूज के दिन बहन से टीका कराने कुछ उपहार आदि लेकर पहुंचे तो यमुना ने उपहार लेने से इंकार कर दिया और कहा हे भाई! मृत्यु के स्वामी! मुझे वचन दो कि आज के दिन जो भाई, बहिन से टीका कराएगा, उसकी उम्र में एक दिन बढ़ जाएगा। यमराज ने कहा "तथास्तु"।इस तरह की अनेक कहानियां इस संबंध में प्रचलित हैं।
आखातीज
छत्तीसगढ़ की अविवाहित लड़कियों का प्रमुख त्यौहार है। वैशाख (अप्रैल-मई) माह का यह उत्सव दूसरे अर्थों में विवाह का स्वरूप लिए है। इसमें अकाव की डालियों का मंडप बनाते हैं। इसके नीचे पड़ोसियों को दावत दी जाती है । कुछ स्थानों पर इसे अक्षय तृतीया भी कहते हैं।
संजा व मामुलिया
संजा अश्विन माह में 16 दिन तक चलने वाला कुआंरी लड़कियों का उत्सव है। लड़कियां प्रति दिन दीवार पर नई-नई आकृतियाँ बनाती हैं और सायं एकत्र होकर गीत गाती हैं। बुन्देलखण्ड क्षेत्र की लड़कियों का ऐसा ही एक पर्व है मामुलिया। किसी वृक्ष की टहनी या झाड़ी (विशेषकर नींबू) को रंगीन कुरता या ओढ़नी पहनाकर उसमें फूलों को उलझाया जाता है। सांझ को लड़कियां इस डाली को गीत गाते हुए किसी नदी या जलाशय में विसर्जित कर देती हैं।
नीरजा
नौ दिन तक चलने वाला महिलाओं का यह उत्सव दशहरे के पूर्व मनाया जाता है। इस अवसर पर स्त्रियाँ मां दुर्गा की पूजा करती हैं। "मालवा" के कुछ क्षेत्रों में गुजरात के "गरबा उत्सव" को कुछ स्थानीय विशेषताओं के साथ इन दिनों मनाते हैं।
घड़ल्या
नीरजा के नौ दिनों में लड़कियां घड़ल्या भी मानती हैं। समूह में लड़कियां, एक लड़की के सिर पर छिद्रयुक्त घड़ा रखती है जिसमें दीपक जल रहा होता है। फिर दरवाजे-दरवाजे जाती हैं और अनाज या पैसा एकत्र करती है। अविवाहित युवक भी इस तरह का एक उत्सव "छला" के रूप में मनाते हैं।
सुआरा
बुंदेलखण्ड क्षेत्र का "सुआरा" पर्व मालवा के घड़ल्या की तरह ही है। दीवार से लगे एक चबूतरे पर एक राक्षस की प्रतिमा बैठाई जाती है। राक्षस के सिर पर शिव-पार्वती की प्रतिमाएं रखी जाती है। दीवार पर सूर्य और चन्द्र बनाए जाते हैं। इसके बाद लड़कियां पूजा करती हैं और गीत गाती हैं।
दशहरा
दशहरा प्रदेश का एक प्रमुख त्यौहार है। इसे विजयादशमी कहते हैं। कुछ क्षेत्रों में इसे विजय के प्रतिक स्वरूप राम की रावण पर विजय के रूप में मनाते हैं। बुन्देलखण्ड क्षेत्र में इस दिन लोग एक-दूसरे से घर-घर जाकर गले मिलते हैं और एक दूसरे को पान खिलाते हैं।
गोवरधन पूजा (गोवर्धन)
कार्तिक माह में दीपावली के दूसरे दिन गोवरधन पूजा होती है। यह पूजा गोवर्धन पर्वत और गौधन से संबंधित है। महिलाएं गोबर से पर्वत और बैलों की आकृतियां बनाती हैं। मालवा में भील आदिवासी पशुओं के सामने अवदान गीत होड़ गाते हैं। गौड़ या भूमिया जैसी जातिया यह पर्व नहीं मनाती पर पशु पालक अहीर इस दिन खेरदेव की पूजा करते हैं। चंद्रावली नामक कथागीत भी इस अवसर पर गाया जाता है।
लारूकाज
गोंडों का नारायण देव के सम्मान में मनाया जाने वाला यह पर्व सुअर के विवाह का प्रतीक माना जाता है। आज कल यह पर्व शनै:-शनै: लुप्त होता जा रहा है। इस उत्सव में सुअर की बलि दी जाती है। परिवार की समृद्धि और स्वास्थ्य के लिए इस तरह का आयोजन एक निश्चित अवधि के बाद करना आवश्यक होता है।
काकसार
स्त्री व पुरूषों को एकान्त प्रदान करने वाला यह पर्व अबूझमाड़िया आदिवासियों का प्रमुख पर्व है। इसकी विशेष बात यह है कि युवा लड़के-लड़कियां एक दूसरे के गांवों में नृत्य करते पहुंचते हैं। वर्षा की फसलों में जब तक बालियां नही फूटती अबूझमाड़िया स्त्री-पुरूषों में एकान्त में मिलना वर्जित होता है। काकसार उनके इस व्रत को तोड़ने का उपयुक्त अवसर होता है। काकसार में लड़के और लड़कियां अलग-अलग घरों में रात भर नाचते और आनन्द मनाते हैं। कई अविवाहित युवक-युवतियों को अपने लिए श्रेष्ठ जीवन साथी का चुनाव करने में यह पर्व सहायक सिद्ध होता है।
रतन्नवा
मंडला जिले के बैगा आदिवासियों का यह प्रमुख त्यौहार है। बैगा आदिवासी इस पर्व के संबंध में अपने पुराण पुरूष नागा-बैगा से बताते हैं। इस बारे में बड़ी रोचक कथा प्रचलित है- एक बार मोहती और अन्हेरा झाड़ियों में लगी शहद से एक बूंद शहद जमीन पर जा गिरी। नागा-बैगा ने उसे उठाकर चख लिया। चखते ही सारी मधुमक्खियां बाघ बन गई। बैगा जान बचाकर भागा। जब वह घर पहुंचा, तो देखा कि सारा घर मधुमक्खियों से भरा है। उसने मधुमक्खियों को वचन दिया कि वह हर नौवें वर्ष उनके पूजन का आयोजन करेगा तब ही उसका छुटकारा हुआ।
होली
रंगों का पर्व होली फाल्गुन महीने में पूर्णिमा को मनाया जाता है। सभी वर्गों के लोग, यहां तक कि आदिवासी भी इसे उतसाह से मनाते हैं। इस पर्व में पांच से सात दिन प्रदेश के विभिन्न अंचलों में अलग-अलग विधियों से लकड़ियां एकत्र कर होली जलाते हैं। इसकी आंग को प्रत्येक गांव वाला अपने घर ले जाता है। यह नई पवित्र आग मानी जाती है। दूसरे दिन से लाग तरह-तरह के स्वांग रचकर मनोरंजन करते हैं और पिचकारियों में रंग भरकर एक दूसरे पर डालते हैं। यह क्रम कई दिन तक चलता है। होली का पर्व लगभग सभी हिन्दू त्यौहारों में सर्वाधिक आनंद, उमंग और मस्ती भरा त्यौहार है।
गंगा दशमी
सरगुजा जिले में आदिवासियों और गैर आदिवासियों द्वारा खाने, पीने और मौज करने के लिए मनाया जाने वाला यह उत्सव जेठ (मई-जून) माह की दसवीं तिथि को पड़ता है। इसका नाम गंगा-दशमी होने का एक कारण है कि हिन्दुओं में यह विश्वास है कि उस दिन पृथ्वी पर गंगा का अवतरण हुआ था। यह पर्व धर्म से सीधा संबंध नहीं रखता। लोग इस दिन अपनी-अपनी पत्नी के साथ नदी किनारे खाते-पीते नाचत-गाते और तरह-तरह के खेल खेलते हैं।
हरेली या हरीरी
किसानों के लिए इस पर्व का विशेष महत्व है। वे इस दिन अपने कृषि उपयोग में आने वाले उपकरणों की पूजा करते हैं। श्रावण माह की अमावस्या को यह पर्व मनाया जाता है। मंडला जिले यह इसी माह की पूर्णिमा को तथा मालवा क्षेत्र में अषाढ़ के महीने में मनाया जाता है। मालवा में इसे "हर्यागोधा" कहते हैं। स्त्रियां इस दिन व्रत रखती हैं।
मेघनाथ
फाल्गुन के पहले पक्ष में यह पर्व गोंड आदिवासी मनाते हैं। इसकी कोई निर्धारित तिथि नही है। मेघनाद गोंडों के सर्वोच्च देवता हैं चार खंबों पर एक तख्त रखा जाता है जिसमें एक छेद कर पुन: एक खंभा लगाया जाता है और इस खंबे पर एक बल्ली आड़ी लगाई जाती है। यह बल्ली गोलाई में घूमती है। इस घूमती बल्ली पर आदिवासी रोमांचक करतब दिखाते हैं। नीचे बैठे लोग मंत्रोच्चारण या अन्य विधि से पूजा कर वातावरण बनाकर अनुष्ठान करते हैं। कुछ जिलों में इसे खंडेरा या खट्टा नाम से भी पुकारते हैं।
भगोरिया
फाल्गुन माह में मालवा क्षेत्र के भीलों का यह प्रिय उत्सव है। इसकी विशेष बात यह है कि इस पर्व में आदिवासी युवक-युवतियों को अपने जीवन साथी का चुनाव करने का अवसर मिलता है। भगोरिया हाट के दिन क्षेत्र भर से किसान, भील आदिवासी सजधज कर तीर तलवारों से लेस होकर हाट वाले गांव में पहुंचते हैं। वहां मैदान में ये लोग डेरे लगाते हैं। हाट के दिन परिवार के बुजुर्ग डेरी में रहते हैं पर अविवाहित युवक-युवतियां हाथ में गुलाल लेकर निकलते हैं। कोई युवक जब अपनी पसन्द की युवती के माथे पर लगा देता है तो और लड़की उत्तर में गुलाल लड़के के माथे पर लगा देती है तो यह समझा जाता है कि दोनों एक दूसरे को जीवन साथी बनाना चाहते हैं।पूर्व स्वीकृति की मोहर तब लग जाती है जब लड़की लड़के के हाथ से माजून (गुड़ और भांग) खा लेती है। यदि लड़की को रिश्ता मंजूर नहीं होता तो वह लड़के के माथे पर गुलाल नहीं लगाती। भगोरिया को दुशमनी निकालने का दिन भी समझा जाता है।

मध्य प्रदेश के प्रमुख मेले
  1. उल्दन का मेला सागर जिले के ग्राम उल्दान में  लगता है।
  2. बनेनी घाट मेला सागर जिले बीना नदी के तट पर लगता है।
  3. सनोधा मेला सागर  में लगता है।
  4. भापेल का मेला सागर
  5. देवरी का मेला सागर
  6. मउसहानिया का मेला छतरपुर जिले के मउसहानिया गांव मंे लगता है।
  7. चरण पादुका का मेला छतरपुर में लगता है इस मेेले को शहीद मेला भी कहा जाता है।
  8. जटाशंकर का मेला छतरपुर के जटाशंकर तीर्थस्थल पर लगता है।
  9. अबार माता का मेला छतरपुर जिले में लगता है।
  10. जल विहार का मेला छतरपुर मंे लगता है।
  11. नांदचांद को मेला पन्ना जिले के ग्राम बगवार मंे भरता है।
  12. कुआंताल का मेला पन्ना जिले के कुआंतल में नवरात्रि पर आयोजित होता है।
  13. कलेही देवी का मेला पन्ना में भरता है।
  14. जनक पुर का मेला पन्ना जिले में भरता है।
  15. प्राणनाथ का शरद समैया मेला पन्ना के प्राणनाथ मंदिर परिसर में भरता है।
  16. कंुडेश्वर का मेला टीकमगढ़ में लगता है।
  17. बड़े बाबा का मेला दमोह के कुण्डलपुर मंे लगता है।
  18. लक्ष्मण कुटी मेला दमोह जिले के हटा रोड़ पर भरता है।
  19. कुंभ का मेला ------------------ उज्जैन 
  20. (यह मेला प्रत्येक 12 वर्षों में एक बार लगता है। इस बार 2016 में आयोजन किया जाएगा।) 
  21. जागेश्वरी देवी का मेला-------- गुना 
  22. नागाजी का मेला ------------- पोरसा (मुरैना )
  23. रामलीला --------------------- -भांडेर( दतिया) 
  24. अमरकंटक का शिवरात्रि का मेला - शहडोल 
  25. काना बाबा का मेला--------- - सोदालपुर (होशंगाबाद)
  26. कालका मंदिर का मेला ------ धार 
  27. मान्धता का मेला ----------- खंडवा 
  28. माध धोधरा का मेला------ - सिवनी 
  29. गरीब नाथ का मेला -------- कोडि़या गांव , शाजापुर 
  30. कालूजी महाराज का मेला -- पिपल्या खुर्द 
  31. चांदी देवी का मेला--------- - सीधी 
  32. रामजी बाबा का मेला-------- होशंगाबाद 
  33. शिवरा़ित्र मेला ---------------पचमढ़ी 
  34. शिंगाजी का मेला------ ----- खरगोन 
  35. हीरा भूमियां का मेला-------- पहाड़गढ़, गुना, ग्वालियर 
  36. रावतपुुरा सरकार मेला------ लहार, भिंड 
  37. पीर बुधन का मेला - -------शिवपुरी 
  38. बाबा शहाबुद्दीन औलिया उर्स - नीमच 
  39. बरमान का मेला ------------ नरसिंपुर 
  40. जलबिहारी का मेला-------- -छतरपुर 
  41. तेजाजी का मेला - ----------भामावाद गांव (गुना) 
  42. धमोनी उर्स - ----------------सागर 
  43. ख्वाजा खानून का उर्स मेला -ग्वालियर 
  44. पशु मेला-------------------- -ग्वालियर 
  45. कंस मेला -------------------सबलगढ़ ( मुरैना) 
  46. रामनवमी मेला - -----------नया गांव 
  47. बड़ोनी मेला -----------------दतिया 
  48. सोनागिरि का मेला------- -दतिया 
  49. सिद्धेश्वर मंदिर मेला -------शिवपुरी
  50. राई नृत्य मेला -------------गुना 
  51. दाउजी का मेला ------------मुरैना गांव 
  52. नवग्रह मेला - --------------खरगौन 
  53. शहीद मेला -----------------सनावद 
  54. चैती मेला -------------------व्याबरा

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