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भारत सरकार के विभिन्न आयोग

राष्ट्रीय भाषायी अल्पसंख्यक आयोग
  • इस आयोग का गठन संविधान के 7वें संशोधन के द्वारा वर्ष 1957 मेँ किया गया था। इसका मुख्यालय इलाहाबाद मेँ है।
  • वर्तमान मेँ भाषायी अल्पसंख्यकोँ की संख्या मेँ निरंतर वृद्धि हो रही है, जिनकी देश की कुल जनसंख्या मेँ लगभग 16 प्रतिशत की भागीदारी है।
अनुसूचित जाति  जनजाति आयोग
  • संविधान के अनुच्छेद 338 (1) मेँ व्यवस्था है कि अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजातियों के लिए एक आयोग बनाया जाएगा, जो अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के राष्ट्रीय आयोग के नाम से जाना जाएगा। आयोग की नियुक्ति राष्ट्रपति करेगा।
  • आयोग अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के लिए संविधान या अन्य विधियों के अधीन उपबंधित रक्षापायों के क्रियान्वयन के संबंध मेँ राष्ट्रपति को प्रतिवर्ष या ऐसे अन्य समयों पर जो आयोग उचित समझे, प्रतिवेदन देगा। राष्ट्रपति ऐसे प्रतिवेदन को संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाएगा।
  • अनुच्छेद 339 (1) के अनुसार राष्ट्रपति आयोग की नियुक्ति आदेश द्वारा किसी भी समय कर सकेगा और इस संविधान के प्रारंभ से 10 साल की समाप्ति पर करेगा। आदेश आयोग मेँ आयोग की संरचना, शक्तियां और प्रक्रिया परिनिश्चित की जा सकेगी और उसमेँ एसे आनुषंगिक या सहायक उपबंध शामिल हो सकेंगे जिन्हें राष्ट्रपति आवश्यक या वांछनीय समझे।
  • केंद्र सरकार ने प्रशासकीय निर्णय के तहत गृह विभाग के 21 जुलाई, 1978 के एक प्रस्ताव द्वारा बहुसदस्यीय राष्ट्रीय अनुसूचित जाति और जनजाति आयोग का गठन, अगस्त 1984 मेँ किया।
  • 1990 मेँ 65वें संविधान संशोधन के द्वारा अनुच्छेद 338 मेँ संशोधन करके अधिकारी की जगह एक आयोग के गठन का प्रावधान किया गया।
  • राष्ट्रीय अनुसूचित जाति तथा जनजाति के एक आयोग के एक अध्यक्ष तथा एक उपाध्यक्ष तथा 5 सदस्य होते हैं। आयोग के मुख्य कार्य निम्नलिखित है –
  1. अनुसूचित जाति और जनजाति की शिकायतोँ की जांच करना तथा इस वर्ग के लिए जितने भी संवैधानिक प्रावधान है, उनका परीक्षण करना।
  2. इन जातियों के लोगोँ के सामाजिक और आर्थिक विकास की प्रगति का मूल्यांकन करना तथा इसके लिए इन्हें जागरुक करना और विकास की प्रक्रिया मेँ शामिल करना।
  3. इन जाति के सदस्यों के संरक्षण के कार्यों पर प्रतिवर्ष राष्ट्रपति को रिपोर्ट देना।
  4. उपर्युक्त के अलावा 5वीं और 6वीं अनुसूची के प्रावधानों के क्रियान्वयन की दिशा में कार्य करना।
  • फ़रवरी 2014 को अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति आयोग को दो आयोगों मेँ विभाजित कर दिया गया।
अनुसूचित जनजाति आयोग
  • राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के नियम को जनजातीय कार्य मंत्रालय ने जारी किया और 20 फरवरी 2004 को इसके का गठन की अधिसूचना जारी की।
  • आयोग का कार्यकाल 3 साल निर्धारित किया गया।
  • आयोग के अध्यक्ष का दर्जा केंद्र के मंत्रिमंडलीय मंत्री, उपाध्यक्ष का 
  • दर्जा केंद्र के राज्य मंत्री तथा सदस्य का दर्जा केंद्र सरकार के सचिव के समकक्ष रखा गया है।
अनुसूचित जाति आयोग
  • विभाजन के पश्चात सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने 20 फरवरी, 2014 को अनुसूचित जाति आयोग के गठन के नियमों को जारी किया।
  • प्रथम अनुसूचित जाति आयोग का गठन सूरजभान की अध्यक्षता मेँ किया गया। फकीर भाई बघेला को आयोग का उपाध्यक्ष तथा फूलचंद वर्मा, वीं देवेंद्र और सुरेखा लांबतूरे को सदस्य नियुक्त किया गया।
  • आयोग के अध्यक्ष का दर्जा केंद्र के मंत्रिमंडलीय मंत्री, उपाध्यक्ष का दर्जा केंद्र के राज्य मंत्री तथा सदस्य का दर्जा केंद्र सरकार के सचिव के समकक्ष रखा गया है।
राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग

  • 23 फरवरी, 2007 को बच्चों को अत्याचार तथा उत्पीड़न से बचाने के लिए राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग का गठन कर दिया गया। आयोग का पहला अध्यक्ष मैग्सेसे अवार्ड विजेता शांता सिन्हा को बनाया गया इसमेँ छह सदस्य होंगे। इसका कार्यकाल तीन वर्ष का होगा।
  • बाल अत्याचार और बाल अपराध रोकने मेँ आयोग की मुख्य भूमिका होगी। इसे सिविल न्यायालय की तरह अधिकार होंगे। इसका स्वरुप राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की तरह होगा।
  • आयोग के प्रमुख कार्य इस प्रकार हैं –
  1. यह बच्चो को आतंकवाद, सांप्रदायिक हिंसा, प्राकृतिक आपदा व घरेलू हिंसा से बचाने के लिए काम करेगा।
  2. बच्चो का शोषण व उन पर अत्याचार न हो, इसका ध्यान रखेगा।
  3. आयोग बाल अधिकारोँ से जुड़े किसी भी मामले की जांच कर सकता है। साथ ही, राज्य सरकारोँ व पुलिस  को निर्देश जारी कर सकता है। इसके पास बच्चों को सताने वाले किसी भी व्यक्ति के खिलाफ सम्मन, नोटिस जारी करने का अधिकार होगा।
राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग

  • राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम 1992 के द्वारा केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग की स्थापना की है।
  • आयोग का मुख्य कार्य केंद्र तथा राज्य सरकारोँ के अधीन अल्पसंख्यकों के विकास की प्रगति का मूल्यांकन करना और अल्पसंख्यको के सामाजिक आर्थिक तथा शैक्षणिक विकास से संबंधित विषय पर उत्पन्न समस्या से सरकार को अवगत कराना है।
आयोग के कार्य
  • संविधान प्रदत्त अल्पसंख्यकों के लिए रक्षोपायो और संसद और राज्य विधानमंडलों द्वारा बने कानून के कार्यान्वयन का संचालन करना।
  • संघ और राज्योँ के अधीन अल्पसंख्यको की उन्नति के लिए किए गए विकास कार्योँ का मूल्यांकन तथा अल्पसंख्यक के हितों की रक्षा के प्रभावकारी कार्यान्वयन के लिए केंद्र तथा राज्य सरकार को सुझाव देना।
केन्द्रीय सतर्कता आयोग

  • सतर्कता के क्षेत्र मेँ केंद्र सरकार के अभिकरणों को परामर्श देने तथा मार्गदर्शन करने के लिए श्री कें संथानम के नेतृत्व मेँ गठित ‘भ्रष्टाचार निरोध से संबंधित समिति’ की अनुशंसा पर फरवरी 1964 मेँ सरकार द्वारा केंद्रीय सतर्कता आयोग की स्थापना की गई।
  • केंद्रीय सतर्कता आयोग को सतर्कता संबंधी सर्वोच्च संस्था माना जाता है, जो किसी भी कार्य पालिका प्राधिकरण के नियंत्रण से मुक्त है। यह केंद्र सरकार के तहत् सतर्कता से संबंधित सभी गतिविधियोँ की निगरानी करता है और केंद्र सरकार के विभिन्न संगठनोँ को उनके सतर्कता कार्योँ की योजना के क्रियान्वयन और सुधार के संबंध मेँ परामर्श देता है।
  • विनीत नारायण बनाम भारत संघ के वाद के संदर्भ मेँ सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त (CVC-Central Vigilence Commissioner) को विधि स्थापित दर्जा देने का निर्देश दिया जो उस समय तक केवल एक परामर्शदात्री निकाय था और केंद्रीय जांच ब्यूरो के कामकाज को प्रभावशाली ढंग से निगरानी के लिए भी इसे उत्तरदायी बनाया।
  • केंद्रीय सतर्कता आयुक्त, जो कि संघ लोक सेवा केँ के अध्यक्ष के स्तर का है, केंद्रीय सतर्कता आयोग का नेतृत्व करता है। कारण यह है कि केंद्रीय सतर्कता आयोग के क्षेत्राधिकार का विस्तार, केंद्र सरकार के सभी विभागोँ, राष्ट्रीयकृत बैंकोँ सहित केंद्र सरकार की कंपनियों तथा केंद्र सरकार के संगठनोँ तक है।
  1. एक केंद्रीय सतर्कता आयुक्त - अध्यक्ष
  2. अन्य सतर्कता आयुक्त
केंद्रीय सतर्कता आयुक्त और सतर्कता आयुक्तों की नियुक्ति
  • केंद्रीय सतर्कता आयुक्त और अन्य सतर्कता आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति अपने हस्ताक्षर और मुहर सहित अधिपत्र द्वारा एक समिति की सिफारिश प्राप्त करने के बाद करता है, जो कि निम्नलिखित लोगोँ से मिलकर बनी होती है-
  1. प्रधानमंत्री - अध्यक्ष
  2. गृहमंत्री - सदस्य
  3. लोकसभा के विपक्ष का नेता - सदस्य
सेवा और शर्तें
  • केंद्रीय सतर्कता आयुक्त का कार्यकाल उसके कार्यकाल मेँ प्रवेश की तारीख से लेकर चार वर्षोँ का होता है या वह अपनी आयु के 65 वर्षोँ तक, (इनमें से जो पहले हो) अपने पद पर बना रहता है। उसका कार्यकाल समाप्त होने के बाद वह दोबारा आयोग मेँ नियुक्ति के लिए अपात्र होगा।
  • कार्यकाल समाप्त होने के बाद केंद्रीय सतर्कता आयुक्त और अन्य सतर्कता आयुक्त भारत सरकार या राज्य सरकार के लाभ के किसी पद को प्राप्त करने के लिए अपात्र होंगे।
केंद्रीय सतर्कता आयुक्त के वेतन और भत्ते और अन्य सेवा शर्तें
  • केंद्रीय सतर्कता आयुक्त, संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष के स्तर का होगा।
  • अन्य सतर्कता आयुक्त, संघ लोक सेवा आयोग के अन्य सदस्योँ के स्तर के होंगे।
केंद्रीय सतर्कता आयुक्त की पदच्युति
  • केंद्रीय सतर्कता आयुक्त या किसी अन्य सतर्कता आयुक्त को उसके पद से केवल सिद्ध कदाचार या अक्षमता के आधार पर राष्ट्रपति के आदेश द्वारा ही हटाया जा सकता है। यदि राष्ट्रपति के निर्देश पर उच्चतम न्यायालय ने जाँच के उपरांत केंद्रीय सतर्कता आयुक्त या किसी अन्य सतर्कता आयुक्त को उक्त आरोपों के आधार पर पदच्युत करने की अनुशंसा की है।
राष्ट्रीय महिला आयोग

  • राष्ट्रीय महिला आयोग विधिक निकाय है। इसका गठन राष्ट्रीय महिला आयोग अधिनियम 1990 के तहत 31 जनवरी, 1992 मेँ किया गया।
  • राष्ट्रीय महिला आयोग अधिनियम 1990 मेँ आयोग के एक अध्यक्ष तथा पांच सदस्योँ का प्रावधान है। इन सबकी नियुक्ति केंद्र सरकार द्वारा की जाती है। अध्यक्ष एवं सदस्य का कार्यकाल 3 वर्षों का होता है।
  • राष्ट्रीय महिला आयोग अधिनियम 1990 के 1 (ख) के अनुसार आयोग समय-समय पर अपनी रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौपेंगा, जो इसे अपनी कार्यवाही रिपोर्ट के साथ संसद के प्रत्येक सदन मेँ पेश करेगा। यदि रिपोर्ट मेँ कोई मामला किसी राज्य से संबंधित है, तो आयोग वह रिपोर्ट या उसके भाग मेँ संबंधित राज्य सरकार को भेजता है, जो कार्यवाही रिपोर्ट के साथ उसे विधानमंडल के सदन मेँ प्रस्तुत करता है।
  • जांच के संबंध मेँ आयोग के पास सिविल कोर्ट का अधिकार होगा। वह भारत के किसी भी भाग से किसी भी व्यक्ति को सम्मन जारी कर सकता है तथा उसकी अपने समक्ष उपस्थिति सुनिश्चित कर सकता है।
  • आयोग के पास अधिनियम की धारा (1) के तहत सिविल न्यायालय के समान शक्ति है। आयोग भारत के किसी क्षेत्र मेँ किसी भी व्यक्ति को अपने सामने उपस्थित होने के लिए बाध्य कर सकता है।
राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग

  • संविधान मेँ पिछड़ोँ की कोई परिभाषा नहीँ दी गई है। अनुच्छेद 340 में पिछड़े वर्ग के लोगोँ की दशा के अन्वेषण के लिए आयोग की नियुक्ति का उपबंध है।
  • संविधान के अनुच्छेद 340 के तहत भारत के राष्ट्रपति ने पहले अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन 29 जनवरी 1953 को काका कालेलकर की अध्यक्षता मेँ किया। सरकार ने इस आयोग की रिपोर्ट को अमान्य कर दिया।
  • राष्ट्रपति ने दुसरे अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन 20 सितम्बर, 1978 को बिन्देश्वरी प्रसाद मंडल की अध्यक्षता मेँ किया।
  • मंडल आयोग की सिफारिशों के आधार पर अगस्त, 1990 मेँ केंद्र सरकार ने सरकारी नौकरियोँ मेँ 27 प्रतिशत स्थान पिछडे वर्गो के लिए आरक्षित करने का निर्णय लिया।
  • आयोग नागरिकोँ के किसी वर्ग को पिछड़े वर्ग की सूची मेँ शामिल करने के आवेदन का पुनरीक्षण करेगा और किसी पिछडे वर्ग को ज्यादा या कम प्रतिनिधित्व की सिफारिशों पर विचार करेगा।
बच्चो के लिए राष्ट्रीय आयोग

  • अप्रैल 2003 मेँ, भारत सरकार ने ‘बच्चो के लिए एक राष्ट्रीय आयोग’ और ‘बच्चो के लिए एक राष्ट्रीय चार्टर’ का प्रस्ताव रखा।
गठन
  • आयोग एक संविधानिक निकाय (statutory body) होगा और 7 सदस्योँ से मिलकर बनेगा, जिसका अध्यक्ष सर्वोच्च न्यायालय का सेवानिवृत्त न्यायाधीश उच्चंन्यायालय का न्यायाधीश या बालकल्याण के क्षेत्र मेँ ख्याति प्राप्त व्यक्ति होगा।
  • अन्य सदस्योँ मेँ बाल स्वास्थ्य, बाल शिक्षा, बाल पालन-पोषण और बाल विकास के क्षेत्र मेँ विशेषज्ञ और पर्याप्त अनुभव रखने वाले व्यक्ति होने चाहिए।
  • यह परामर्शदात्री निकाय है और इसका निर्माण सरकार के ऊपर बाध्यकारी नहीँ है।
शक्तियाँ और कार्य
  • बच्चो के अधिकार और उसके विकास से संबंधित मामलोँ की जांच और छानबीन या तो स्वयं करेगा या फिर उनके अधिकारोँ के उल्लंघन की शिकायत प्राप्त होने पर करेगा।
  • यह सरकार को बच्चो से संबंधित नीति बनाते समय सलाह देगा।
  • वह बच्चो से सम्बंधित नीति बनाते समय सलाह देगा। वह बच्चों से सम्बद्ध ऐसी नीतियों और उनके क्रियान्वयन की समीक्षा भी करेगा।
  • यह बच्चों और उनके लिए बनी नीतियों और उनके क्रियान्वयन से संबंधित मामलोँ पर रिपोर्ट तैयार करेगा और केंद्र सरकार को प्रस्तुत करेगा।
  • यह बच्चों के विकास के क्षेत्र मेँ हो रही खोजों को बढ़ावा भी देगा और बच्चो को शिक्षा देने मेँ सहायता भी प्रदान करेगा।
आयोग का महत्व
  • बच्चो के हितों को बढ़ावा देने के लिए यह एक अद्वितीय विधायन है और यह इस कार्य मेँ बहुत दूर तक जाएगा।
  • यह बच्चों के कार्य-स्थल पर होने वाले दुर्वव्हार पर भी ध्यान देगा जैसे बाल श्रम, बर्बरता और और हिंसा (विशेष रुप से यौन संबंधी)।
  • बच्चो के सर्वांगीण विकास का नेतृत्व करेगा।

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