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संघीय कार्यपालिका,राष्ट्रपति,राष्ट्रपति की शक्तियां,भारत के महान्यायवादी,ध्वज संहिता

भारत मेँ ब्रिटेन की भांति संसदीय शासन व्यवस्था अपनाई गई है। इस व्यवस्था मेँ कार्यपालिका व्यवस्थापिका का एक हिस्सा होती है। भारत का राष्ट्रपति ब्रिटेन की राजा की तरह संवैधानिक शासक है। वास्तविक शक्तियां मंत्रिपरिषद, जिसका प्रधान, प्रधानमंत्री होता है, में निहित होती हैं। भारत मेँ कार्यपालिका के अंतर्गत राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति और मंत्रिपरिषद आते हैं।
राष्ट्रपति
  • अनुच्छेद 52 मेँ कहा गया है कि भारत का एक राष्ट्रपति होगा।
  • अनुच्छेद 53 मेँ कहा गया है कि संघ की सभी कार्यपालिका संबंधी शक्ति राष्ट्रपति मेँ निहित होगी।
  • इस प्रकार भारतीय संघ की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति मेँ निहित है।
  • पर भारत मेँ संसदीय व्यवस्था को अपनाया गया है। अतःराष्ट्रपति नाममात्र की कार्यपालिका है। तथा प्रधान मंत्री और उसका मंत्रिमंडल वास्तविक कार्यपालिका है।
  • भारत के राष्ट्रपति, भारत का प्रथम नागरिक कहलाता है।
  • भारत के राष्ट्रपति पद पर कोई भी भारत का नागरिक, जोकि निर्धारित योग्यताएं पूरी करता है, पदासीन हो सकता है।
  • भारत का राष्ट्रपति बनने के लिए व्यक्ति की आयु कम से कम 35 वर्ष की होनी चाहिए।
  • राष्ट्रपति बनने वाला व्यक्ति लोकसभा का सदस्य निर्वाचित होने की योग्यताएं पूरी करता हो।
  • राष्ट्रपति किसी भी सदन (व्यवस्थापिका या संसद) का सदस्य नहीँ होता है।
  • राष्ट्रपति का निर्वाचन अप्रत्यक्ष रुप से एक निर्वाचक मंडल द्वारा होता है।
  • निर्वाचक मंडल मेँ राज्यसभा, लोकसभा और राज्यों की विधान सभा के निर्वाचित सदस्य होते हैं। नवीनतम व्यवस्था के अनुसार पुदुचेरी तथा दिल्ली विभानसभा के निर्वाचित सदस्योँ को भी इस निर्वाचक मंडल मेँ सम्मिलित किया गया है।
  • राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के लिए 50 सदस्य प्रस्तावक तथा 50 सदस्य अनुमोदक होंगे।
  • राष्ट्रपति का निर्वाचन अप्रत्यक्ष आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत प्रणाली के अनुसार होता है।
  • राष्ट्रपति का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है। वह पुनर्निर्वाचन का पात्र भी है तथा 5 वर्ष से पूर्व महाभियोग लगाकर ही उसे पद से हटाया जा सकता है। वह अपना त्यागपत्र उपराष्ट्रपति को देकर स्वयं पद से हट सकता है।
  • राष्ट्रपति को पद की शपथ भारत का मुख्य न्यायधीश दिलाता है और उसकी अनुपस्थिति मेँ सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठतम् न्यायाधीश।
  • महाभियोग संसद के किसी भी सदन द्वारा लाया जा सकता है। यह एक सदन द्वारा लगाया जाता है तथा दूसरा सदन उसका अन्वेषण करता है।
  • महाभियोग संविधान के उल्लंघन के सम्बन्ध में लगाया जाता है तथा इसके लिए 14 दिन पूर्व लिखित सूचना देकर इस आशय का संकल्प पारित कराया जाता है।
  • राष्ट्रपति को महाभियोग के अन्वेषण के समय अव्यं उपस्थित होने तथा अपना पक्ष प्रस्तुत करने का अधिकार है।
  • महाभियोग की प्रक्रिया अर्द्ध न्यायिक होती है।
  • अन्य किसी कारण से, यथा-राष्ट्रपति की मृत्यु आदि से स्थायी रुप से राष्ट्रपति का पद रिक्त हो जाता है, तो उपराष्ट्रपति तुरंत राष्ट्रपति पद पर कार्य करना प्रारंभ कर देगा, तथा नए राष्ट्रपति द्वारा पद धारण करने पक कार्य करता रहेगा।
  • यदि किसी कारणवश चुनाव मेँ विलंब हो जाए तो पदासीन राष्ट्रपति पद पर बना रहता है जब तक की नया राष्ट्रपति पद ग्रहण ना कर ले, उल्लेखनीय है कि इस समय उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति के रुप मेँ कार्य नहीँ करता। राष्ट्रपति का निर्वाचन पद रिक्त होने की अवधि के भीतर हो जाना चाहिए।
  • राष्ट्रपति का बीमारी या अन्य किसी कारण से राष्ट्रपति पद पर हुई अस्थाई रिक्ति के समय उपराष्ट्रपति, राष्ट्रपति के रुप मेँ कार्य करता है।
  • डॉ. राजेंद्र प्रसाद भारत के प्रथम राष्ट्रपति थे। वह लगातार दो बार राष्ट्रपति निर्वाचित हुए।
  • डॉ. एस. राधाकृष्णन लगातार दो बार उपराष्ट्रपति तथा एक बार राष्ट्रपति रहे।
  • केवल वी. वी. गिरी के निर्वाचन के समय दूसरे चक्र की मतगणना करनी पड़ी। अभी तक दूसरे चक्र की गणना से गिरी ही राष्ट्रपति निर्वाचित हुए थे।
  • श्री वी.वी. गिरी ही ऐसे राष्ट्रपति निर्वाचित हुए जिन्होंने ने निर्दलीय उम्मीदवार के रुप मेँ चुनाव मेँ सफलता प्राप्त की।
  • केवल नीलम संजीव रेड्डी ऐसे राष्ट्रपति हुए जो एक बार चुनाव मेँ पराजित हुआ तथा बाद मेँ निर्विरोध निर्वाचित हुए।
  • डॉ. राजेंद्र प्रसाद, फखरुद्दीन अली अहमद, नीलम संजीव रेड्डी, ज्ञानी जैल सिंह, ए.पी.जे. अब्दुल कलाम, प्रतिभा पाटिल और प्रणव मुखर्जी को छोड़कर अन्य सभी राष्ट्रपति पूर्व मेँ उपराष्ट्रपति के पद पर रहे हैं।
राष्ट्रपति की प्रशासनिक शक्तियां
  • भारत सरकार की सभी कार्यपालिका शक्ति का प्रयोग राष्ट्रपति के नाम से किया जाता है।
  • राष्ट्रपति वास्तविक कार्यपालिका नहीँ है, अपितु वह संवैधानिक प्रधान है।
  • 42वेँ संविधान संशोधन अधिनियम ने राष्ट्रपति को मंत्रिपरिषद की सलाह मानने के लिए बाध्य कर दिया है।
  • 44वें संविधान संशोधन द्वारा राष्ट्रपति को मंत्रिपरिषद की सलाह को केवल एक बार पुनर्विचार के लिए प्रेषित करने का अधिकार दिया गया है। यदि मंत्रिपरिषद अपने विचार पर टिकी रहती है, तो राष्ट्रपति उसकी सलाह मानने के लिए बाध्य होगा।
  • राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की नियुक्ति करता है और प्रधानमंत्री की सलाह से अन्य मंत्रियोँ की भी नियुक्ति करता है।
  • राष्ट्रपति भारत के महान्यायवादी की नियुक्ति करता है तथा वह राष्ट्रपति के प्रसाद पर्यंत उत्तरदायी होता है।
  • इसके अलावा राष्ट्रपति, नियंत्रक महालेखा परीक्षक, उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश, राज्योँ के राज्यपाल, उच्च न्यायालय के न्यायाधीश, संघ लोक सेवा आयोग तथा राज्योँ के संयुक्त लोक सेवा आयोग, वित्त आयोग, निर्वाचन आयोग के सदस्य तथा मुख्य निर्वाचन आयुक्त, विभिन्न अन्य आयोग-राजभाषा आयोग, अल्पसंख्यक तथा पिछड़ा वर्ग आयोग और अनुसूचित क्षेत्रोँ के लिए आयोग आदि।
  • राष्ट्रपति संघीय प्रशासन से संबंधित किसी भी प्रकार की सूचना प्रधानमंत्री से प्राप्त कर सकता है।
  • इसके अलावा राष्ट्रपति प्रत्यक्ष रुप से संघीय राज्योँ का प्रशासन उप-राज्यपाल अथवा आयुक्त के माध्यम से देखता है।
राष्ट्रपति की विधायी शक्तियां
  • राष्ट्रपति संसद का अभिन्न अंग है (अनुच्छेद 79)।
  • राष्ट्रपति संसद के दोनो सदनों को आहूत करने, सत्रावसान करने और लोकसभा का विघटन करने की शक्ति रखता है।
  • राष्ट्रपति लोकसभा के प्रति एक साधारण निर्वाचन के पश्चात प्रथम सत्र के प्रारंभ मेँ तथा प्रत्येक वर्ष के प्रथम सत्र के आरंभ मेँ एक साथ संसद के दोनो सदनोँ मेँ प्रारंभिक अभिभाषण करता है।
  • राष्ट्रपति को संसद मेँ विधायी-विषयों के संबंध मेँ संदेश भेजने का अधिकार है।
  • लोकसभा अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष के पद खाली होने की स्थिति मेँ राष्ट्रपति उस पद के लिए लोकसभा के किसी भी सदस्य को नियुक्त कर सकता है और यही कार्य राज्यसभा मेँ सभापति तथा उपसभापति की अनुपस्थिति मेँ भी करता है।
  • राष्ट्रपति को लोकसभा मेँ एंग्लो इंडियन समुदाय के दो व्यक्ति तथा राज्य सभा मेँ 12 सदस्य मनोनीत करने का अधिकार है।
  • संसद द्वारा वांछित कोई भी विधेयक तभी कानून बनता है, जब उस पर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर हो जाते हैं।
  • राष्ट्रपति वार्षिक वित्तीय वितरण, नियंत्रक महालेखा परीक्षक का प्रतिवेदन, वित्त आयोग की सिफारिश तथा अन्य आयोग की रिपोर्ट संसद मेँ प्रस्तुत करवाता है।
  • कुछ विषयों से संबंधित विधेयक संसद मेँ प्रस्तुत करवाने से पूर्व राष्ट्रपति की अनुमति आवश्यक होती है, जैसे-राज्योँ की सीमा परिवर्तन और धन विधेयक।
  • राष्ट्रपति किसी भी विधेयक को अनुमति दे सकता है। उसे पुनर्विचार के लिए वापस भेज सकता है, तथा उस पर अपनी अनुमति रोक सकता है। लेकिन धन विधेयक पर राष्ट्रपति को अनिवार्य रुप से अनुमति देनी होती है तथा उसे पुनर्विचार के लिए वापस नहीँ भेज सकता है। संविधान संशोधन विधेयक के लिए भी इसी प्रकार का प्रावधान है।
  • यदि राष्ट्रपति द्वारा संसद को पुनर्विचार के लिए वापस किया गया विधेयक पुनः विचार करने के पश्चात राष्ट्रपति की अनुमति के लिए प्रस्तुत किया जाता है, तो इस पर वह अनिवार्य रुप से अनुमति देगा।
  • संविधान मेँ राष्ट्रपति को किसी विधायक को अनुमति देने या अनुमति न देने के संबंध मेँ कोई समय सीमा निर्धारित नहीँ की गई है।
  • राष्ट्रपति को किसी विधेयक पर अनुमति देने या न देने के निर्णय लेने की समय सीमा का अभाव होने के कारण राष्ट्रपति वीटो का प्रयोग कर सकता है।
  • राष्ट्रपति जब संसद का सत्र न चल रहा हो तथा किसी विषय पर तुरंत विधान बनाने की आवश्यकता हो तो वह अध्यादेश द्वारा विधान बना सकता है।
  • राष्ट्रपति द्वारा बनाये गए अध्यादेश संसद के विधान की तरह होते हैं, लेकिन अध्यादेश अस्थायी होते हैं।
  • राष्ट्रपति अध्यादेश अपनी मंत्रिपरिषद की सलाह से जारी करता है।
  • संसद का अधिवेशन होने पर अध्यादेश संसद के समक्ष रखा जाना चाहिए, यदि संसद उस अध्यादेश को अधिवेशन प्रारंभ होने की तिथि से 6 सप्ताह के भीतर पारित नहीँ कर देती तो वह स्वयं ही निष्प्रभावी हो जाएगा।
  • 44वेँ संविधान संशोधन, 1978 द्वारा यह अभिनिर्धारित किया गया है कि, राष्ट्रपति के अध्यादेश निकालने की परिस्थितियोँ को असदभावनापूर्ण होने का संदेह होने पर न्यायालय मेँ चुनौती दी जा सकती है।
राष्ट्रपति की न्यायिक शक्तियां
  • राष्ट्रपति सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायधीश तथा अन्य न्यायाधीशों की और उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति करता है।
  • राष्ट्रपति किसी सार्वजनिक महत्व के विषय पर उच्चतम न्यायालय से अनुच्छेद 143 के अधीन परामर्श ले सकता है। लेकिन वह परामर्श मानने के लिए बाध्य नहीँ है।
  • राष्ट्रपति किसी सैनिक न्यायालय द्वारा दिए गए दंड को, कार्यपालिका के क्षेत्राधिकार के अंतर्गत दिए गए दंड को को, तथा अपराधी को मृत्युदंड दिए जाने की स्थिति मेँ क्षमादान दे सकता है। दंड को कम कर सकता है। दंड की प्रकृति को परिवर्तित कर सकता है। दंड को निलंबित कर सकता है।
राष्ट्रपति की आपातकालीन शक्तियां
  • राष्ट्रपति तीनो सेनाओं का सर्वोच्च सेनापति होता है, वह तीनों सेनाओं के सेनाध्यक्षों की नियुक्ति करता है। राष्ट्रपति को युद्ध या शांति की घोषणा करने तथा रक्षा बलों को अभिनियोजित करने का अधिकार है। लेकिन राष्ट्रपति के अधिकार संसद द्वारा नियंत्रित हैं।
  • राष्ट्रपति 3 परिस्थितियो में आपात लागू कर सकता है:
  1. युद्ध वाह्य आक्रमण या विद्रोह से यदि भारत या उसके किसी भाग की सुरक्षा संकट मेँ हो (अनुच्छेद 352)।
  2. किसी राज्य मेँ संवैधानिक तंत्र के विफल हो जाने, केंद्र की आज्ञा का अनुपालन न करने, अथवा संविधान के अनुबंधों का पालन न करने की स्थिति मेँ (अनुच्छेद 356) आपातकाल की घोषणा कर सकता है। विधानमंडल की शक्तियां संसद को सौंप दी जाती हैं।
  3. भारत मेँ वित्तीय संकट उत्पन्न होने पर राष्ट्रपति वित्तीय आपात की उद्घोषणा (अनुच्छेद 360) कर सकता है। जिसके अंतर्गत राज्योँ के व्यय को नियंत्रित करके और लोक सेवकों के वेतन घटाकर तथा अन्य उपाय करके वित्तीय स्थायित्व प्रदान करने का प्रयास करता है।
भारत के महान्यायवादी

  • अनुच्छेद 76 के कथानुसार, राष्ट्रपति उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त होने की योग्यता रखने वाले किसी व्यक्ति को भारत का महान्यायवादी नियुक्त करेगा।
  • वह भारत सरकार का प्रथम विधि अधिकारी होगा।
  • यह परंपरा है कि सरकार परिवर्तित होने पर महान्यायवादी त्यागपत्र दे देता है तथा नई सरकार अपनी रुचि के अनुसार किसी व्यक्ति को महान्यायवादी नियुक्त करती है।
  • वह विधि संबंधी किसी भी विषय पर भारत सरकार को परामर्श देता है। वह भारत के राष्ट्रपति द्वारा सौंपे गए किसी भी विधि संबंधी कार्य को पूरा करता है। वह संविधान या राष्ट्रपति द्वारा प्रदान किए गए किसी भी कार्य को संपन्न न करता है।
  • अपने कर्तव्यों के निर्वाह में वह भारतीय क्षेत्र के सभी न्यायालयों मेँ श्रोता होने का अधिकारी होगा।
  • जिन वादों मेँ भारत सरकार को परामर्श देने के लिए उसे बुलाया जाता है, उसमेँ वह भारत सरकार के विरुद्ध न तो कोई परामर्श देगा और न ही कोई विवरण देगा। न ही वह भारत सरकार की अनुमति के बिना अपराधिक मामलोँ के किसी अभियुक्त का बचाव करेगा।
  • वह किसी कंपनी के निदेशक के रुप मेँ नियुक्त नहीँ हो सकता।
  • महान्यायवादी न्यायालय के समक्ष केंद्र व राज्यों का प्रतिनिधित्व करता है। परंतु उसे निजी तौर पर (कानून संबंधी) पेशा करने का अधिकार है, बशर्ते कि किसी वाद का एक पक्ष स्वयं राज्य न हो।
  • भारत के महान्यायवादी नियुक्त होने के लिए एक व्यक्ति के पास वही अहर्ताएं होनी चाहिए जो उच्चतम न्यायालय के न्यायधीश के रुप मेँ नियुक्ति के लिए अपेक्षित होती हैं। चूँकि यह एक राजनीतिक नियुक्ति है, अतः प्रजा द्वारा सरकार बदलने पर महान्यायवादी का पद त्याग करना बाध्य है।
  • महान्यायवादी को उच्चतम न्यायालय के न्यायधीश के बराबर प्रतिधारण शुल्क दिया जाता है और वह विधि व्यवसाय के लिए स्वतंत्र है, बशर्ते की वह राज्य के विरुद्ध न खड़ा हो।
  • अपने कार्योँ का पालन करने के लिए उसे देश के किसी भी न्यायालय मेँ सुनवाई का अधिकार है।
  • संसद के किसी भी सदन मेँ या उसकी समिति की बैठक मेँ भाग लेने का अधिकार है।
  • दो सॉलिसिटर जनरल और 4 एडिशनल सॉलिसिटर जनरल प्रदान किए जाते हैं।
  • महिला सशक्तिकरण से संबंधित प्रमुख अधिनियनम
     1. दत्तक ग्रहण हेतु मार्गदर्शक सिद्धांत, 2015 
    2. किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) आदर्श नियम 2016 
    3. महिलाओं का अशिष्ट रूपण प्रतिषेध अधिनियम-1986 
    4. दहेज निषेध अधिनियम, 1961 
    5. घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम, 2005 
    6. कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 
    7. बाल-विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 
    8. लैंगिक अपराधों से बालकों को संरक्षण अधिनियम, 2012 
    9. किशोर न्याय (बाल देखरेख एवं संरक्षण) अधिनियम, 2015
    झंडा विवाद तथा नवीन ध्वज संहिता,कर्तव्यों का क्रियान्वयन,नवीन ध्वज संहिता
    • पुरानी ध्वज संहिता, जिसमें प्राचीन कालीन प्रावधानोँ की एक लंबी सूची थी, मेँ झंडा फहराने का अधिकार कुछ ही व्यक्तियोँ का विशेषाधिकार था।
    • वर्ष 2002 मेँ जिंदल समूह के उपाध्यक्ष नवीन जिंदल ने झंडा फहराने के अपने अधिकार पर प्रतिबंध को चुनौती देते हुए दिल्ली उच्च यायालय मेँ जनहित याचिका दायर की।
    • दिल्ली उच्च यायालय के आदेश की तिरंगा फहराना मौलिक अधिकार है तथा इसके बाद ध्वज संहिता के उदारीकरण के प्रश्नोँ के परिरक्षण हेतु समिति गठित करने के सर्वोच्च नयायालय की अनुशंसा के पश्चात सरकार ने समिति गठित की। समिति की अनुशंसा के आधार पर केंद्रीय मंत्रिमंडल ने तिरंगा फहराने से संबंधित अनावश्यक कठोर नियमो मेँ छूट देने का निर्णय लिया है।
    नवीन ध्वज संहिता
    • कोई भी व्यक्ति केवल सूर्योदय से सूर्यास्त तक ही झंडा फहरा सकता है।
    • झंडे की चौड़ाई व लम्बाई का अनुपात 2:3 होना चाहिए।
    • इसे वस्त्र गद्दे या नैपकिन पर प्रिंट नहीँ करना चाहिए।
    • अंत्येष्टि के कफन के रुप मेँ इसका प्रयोग न करेँ। वाहनों पर झंडा न लपेटें।
    • इसका उपरी भाग नीचे (अर्थात उल्टा) करके न फहराएँ व इसे जमीं से स्पर्श नहीं करना चाहिए।
    • सयुंक राष्ट्र व अन्य देशों के झंडों को छोड कर इसे सभी झंडो से ऊंचा फहराना चाहिए।
    • क्षतिग्रस्त झंडे को न फहराएं।
    • संशोधित संहिता 26 जनवरी, 2003 से लागू की गई।
    कर्तव्यों का क्रियान्वयन
    • 42वेँ संविधान संशोधन द्वारा संविधान मेँ जिन कर्तव्यों को सम्मिलित किया गया है, सांविधिक कर्तव्य (statutory duties) हैं और वे विधि द्वारा (enforceable law) होंगे।
    • उन कर्तव्योँ के अनुपालन मेँ विफल होने पर दंड का आरोपण करने के लिए संसद विधि द्वारा दंड विधान करेगी।
    • हालांकि इस प्रावधान की सफलता बहुत हद तक उस तरीके पर निर्भर करेगी, जिस पर तथा जिन व्यक्तियोँ के ऊपर इन कर्तव्योँ को लागू किया गया है।

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